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समास

समास — संस्कृत व्याकरण | समास के भेद एवं उदाहरण

समास

समसनं समासः

संस्कृत व्याकरण में समास का अर्थ है— दो या दो से अधिक शब्दों को संक्षिप्त करके एक नया शब्द बनाना।

समास की परिभाषा

समास का शाब्दिक अर्थ होता है— संक्षेप। दो या दो से अधिक शब्दों के मिलने से जो तीसरा नया और संक्षिप्त रूप बनता है, वह समास कहलाता है।

समसनं समासः — अर्थात् शब्दों को संक्षिप्त करके एक रूप में प्रस्तुत करना समास कहलाता है।

समास के मुख्य भेद

1. अव्ययीभाव पूर्वपद प्रधान
2. तत्पुरुष उत्तरपद प्रधान
3. बहुव्रीहि अन्यपद प्रधान
4. द्वन्द्व उभयपद प्रधान

1 अव्ययीभाव समास

इस समास में पहला पद अव्यय होता है और वही प्रधान होता है। समस्तपद भी अव्यय बन जाता है।

उदाहरण: निर्मक्षिकम् — मक्षिकाणाम् अभावः।

यहाँ प्रथम पद ‘निर्’ है। मक्षिका की प्रधानता न होकर मक्षिका के अभाव की प्रधानता है। अतः यह अव्ययीभाव समास है।

उपग्रामम्
ग्रामस्य समीपे
समीपता की प्रधानता
निर्जनम्
जनानाम् अभावः
अभाव की प्रधानता
अनुरथम्
रथस्य पश्चात्
पश्चात् की प्रधानता
प्रतिगृहम्
गृहं गृहं प्रति
प्रत्येक की प्रधानता
यथाशक्ति
शक्तिम् अनतिक्रम्य
सीमा की प्रधानता
सचक्रम्
चक्रेण सहितम्
सहित की प्रधानता

2 तत्पुरुष समास

प्रायेण उत्तरपदार्थप्रधानः तत्पुरुषः

इस समास में प्रायः उत्तरपद की प्रधानता होती है और पूर्वपद उत्तरपद के विशेषण का कार्य करता है। समस्तपद में पूर्वपद की विभक्ति का लोप हो जाता है।

उदाहरण: राजपुरुषः — अर्थात् राजा का पुरुष। यहाँ पुरुष की प्रधानता है और राजा शब्द पुरुष के विशेषण का कार्य करता है।

ग्रामगतः
ग्रामं गतः
शरणागतः
शरणम् आगतः
देशभक्तः
देशस्य भक्तः
सिंहभीतः
सिंहात् भीतः
भयापन्नः
भयम् आपन्नः
हरित्रातः
हरिणा त्रातः

2.1 कर्मधारय समास

इस समास में एक पद विशेष्य तथा दूसरा पद पहले पद का विशेषण होता है। विशेषण-विशेष्य भाव के अतिरिक्त उपमान-उपमेय भाव भी कर्मधारय समास का लक्षण है।
पीताम्बरम्
पीतं च तत् अम्बरम्
महापुरुषः
महान् च असौ पुरुषः
कज्जलमलिनम्
कज्जलम् इव मलिनम्
नीलकमलम्
नीलं च तत् कमलम्
मीननयनम्
मीन इव नयनम्
मुखकमलम्
कमलम् इव मुखम्

2.2 द्विगु समास

संख्यापूर्वो द्विगुः

इस समास में पहला पद संख्यावाची होता है और समाहार अर्थात् एकत्रीकरण या समूह अर्थ की प्रधानता होती है।

उदाहरण: त्रिभुजम् — त्रयाणां भुजानां समाहारः।

पञ्चपात्रम्
पञ्चानां पात्राणां समाहारः
पञ्चवटी
पञ्चानां वटानां समाहारः
सप्तर्षिः
सप्तानां ऋषीणां समाहारः
चतुर्युगम्
चतुर्णां युगानां समाहारः

3 बहुव्रीहि समास

अन्यपदप्रधानः बहुव्रीहिः

इस समास में पूर्व तथा उत्तर पदों की प्रधानता न होकर किसी अन्य पद की प्रधानता होती है।

उदाहरण: पीताम्बरः — पीतम् अम्बरम् यस्य सः (विष्णुः)। यहाँ न तो ‘पीतम्’ की प्रधानता है और न ‘अम्बरम्’ की। यहाँ पीताम्बर धारण करने वाले किसी अन्य व्यक्ति की प्रधानता है।
पीताम्बरः
पीतम् अम्बरम् यस्य सः
विष्णुः
नीलकण्ठः
नीलः कण्ठः यस्य सः
शिवः
दशाननः
दश आननानि यस्य सः
रावणः
अनेककोटिसारः
अनेककोटिः सारः यस्य सः
धनी
विगलितसमृद्धिम्
विगलिता समृद्धिः यस्य तम्
पुरुषम्
प्रक्षालितपादम्
प्रक्षालितौ पादौ यस्य तम्
जनम्

4 द्वन्द्व समास

उभयपदार्थप्रधानः द्वन्द्वः

इस समास में पूर्वपद और उत्तरपद दोनों की समान रूप से प्रधानता होती है। पदों के बीच विग्रह करते समय ‘च’ का प्रयोग होता है।

रामलक्ष्मणौ
रामश्च लक्ष्मणश्च
मातापितरौ
माता च पिता च
धर्मार्थकाममोक्षाः
धर्मश्च अर्थश्च कामश्च मोक्षश्च
वसन्तग्रीष्मशिशिराः
वसन्तश्च ग्रीष्मश्च शिशिरश्च

त्वरित पुनरावृत्ति

अव्ययीभाव पहला पद प्रधान
तत्पुरुष उत्तरपद प्रधान
कर्मधारय विशेषण + विशेष्य
द्विगु संख्या + समाहार
बहुव्रीहि अन्यपद प्रधान
द्वन्द्व दोनों पद प्रधान

© संस्कृत व्याकरण | समास एवं उसके भेद

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