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5. दानवीरः कर्णः

दानवीरः कर्णः

संस्कृत एवं हिंदी अनुवाद

शकः–कर्णः संवाद

प्रारम्भिक संवाद
संस्कृत ततः प्रविशति ब्राह्मणवेषधारी शकः।
हिंदी अनुवाद उसके बाद ब्राह्मण का वेश धारण किए हुए शक प्रवेश करता है।
शकः
संस्कृत भो कर्ण! महत्तरां भिक्षां याचे।
हिंदी अनुवाद हे कर्ण! मैं आपसे बड़ी भिक्षा माँगता हूँ।
कर्णः
संस्कृत भगवान्! कर्णोऽहं भवन्तं नमस्करोमि। आज्ञापय किमिच्छसि किं ददामि।
हिंदी अनुवाद हे भगवान! मैं कर्ण हूँ और आपको प्रणाम करता हूँ। आज्ञा दीजिए, आप क्या चाहते हैं? मैं आपको क्या दूँ?
शकः
संस्कृत महत्तरां भिक्षां याचे।
हिंदी अनुवाद मैं बहुत बड़ी भिक्षा माँगता हूँ।
कर्णः
संस्कृत महत्तरां भिक्षां भवते प्रदास्ये। गोसहस्रं ददामि।
हिंदी अनुवाद मैं आपको बड़ी भिक्षा दूँगा। मैं आपको एक हजार गायें देता हूँ।
कर्ण द्वारा दान की प्रस्तुतियाँ
शकः
संस्कृत मुहूर्तं क्षीरं पिबामि। नेच्छामि कर्ण!
हिंदी अनुवाद मैं क्षणभर दूध पीता हूँ। हे कर्ण! मुझे यह नहीं चाहिए।
कर्णः
संस्कृत किं नेच्छति भवान्? वाजिनां सहस्रं ते ददामि।
हिंदी अनुवाद आप क्या नहीं चाहते? मैं आपको एक हजार घोड़े देता हूँ।
शकः
संस्कृत मुहूर्तकमहोऽस्मि। नेच्छामि कर्ण! नेच्छामि।
हिंदी अनुवाद मुझे यह भी नहीं चाहिए, कर्ण! मुझे नहीं चाहिए।
कर्णः
संस्कृत एते वारुणानां वृन्दं ददामि।
हिंदी अनुवाद मैं आपको इन हाथियों का पूरा समूह देता हूँ।
शकः
संस्कृत एतदपि नेच्छामि।
हिंदी अनुवाद मुझे यह भी नहीं चाहिए।
कर्णः
संस्कृत अन्यदपि श्रूयताम्। अपर्याप्तं कनकं ददामि।
हिंदी अनुवाद और भी सुनिए। मैं आपको असीमित सोना देता हूँ।
शकः
संस्कृत गृहीत्वा गच्छामि। (गत्वा पुनरागत्य च) नेच्छामि कर्ण! नेच्छामि।
हिंदी अनुवाद मैं इसे लेकर जाता हूँ। (जाकर फिर लौटकर) हे कर्ण! मुझे यह भी नहीं चाहिए।
कर्णः
संस्कृत तेन हि जिता पृथिवीं ददामि।
हिंदी अनुवाद तब मैं आपको जीती हुई पूरी पृथ्वी ही दे देता हूँ।
शकः
संस्कृत पृथिव्या किं करिष्यामि?
हिंदी अनुवाद मैं पूरी पृथ्वी का क्या करूँगा?
कर्णः
संस्कृत तेन हि मच्छिरो ददामि।
हिंदी अनुवाद तब मैं आपको अपना सिर ही दे देता हूँ।
कर्ण का कवच-कुण्डल दान
शकः
संस्कृत अविहा! अविहा!
हिंदी अनुवाद अरे! अरे!
कर्णः
संस्कृत न भेतव्यम्, न भेतव्यम्। प्रसीदतु भगवान्। अन्यदपि श्रूयताम्— भगवते यदि उचितं स्यात् कुण्डलाभ्यां सह कवचं ददामि।
हिंदी अनुवाद भयभीत मत होइए, भयभीत मत होइए। भगवान् प्रसन्न हों। एक और बात सुनिए— यदि आपको उचित लगे तो मैं कुण्डलों के साथ अपना कवच भी दे देता हूँ।
शकः
संस्कृत (सहर्षम्) ददातु, ददातु।
हिंदी अनुवाद (बहुत प्रसन्न होकर) दीजिए, दीजिए।
कर्णः
संस्कृत (आत्मगतम्) एषः एवास्तु कामः। (प्रकाशम्) गृह्यताम्।
हिंदी अनुवाद (मन में) यही मेरी इच्छा पूरी हो। (प्रकट रूप से) लीजिए।
शल्यराजः
संस्कृत अङ्गराज! न दातव्यम्, न दातव्यम्!
हिंदी अनुवाद हे अंगराज! यह नहीं देना चाहिए, यह नहीं देना चाहिए!
कर्णः
संस्कृत शल्यराज! अलम् अलं वारयितुम्।
हिंदी अनुवाद हे शल्यराज! बस, मुझे रोकने का प्रयास मत कीजिए।
पश्य — श्लोक
शिक्षा क्षयं गच्छति कालपर्ययात्।
सुसूक्ष्ममूला निपतन्ति पादपाः।
जलं जलस्थानगतं च शुष्यति।
हुतं च दत्तं च तथैव तिष्ठति॥
हिंदी भावार्थ:

समय बीतने के साथ शिक्षा या ज्ञान का प्रभाव कम हो सकता है। बहुत गहरी जड़ों वाले पेड़ भी समय आने पर गिर जाते हैं। अपने स्थान पर स्थित जल भी धीरे-धीरे सूख जाता है। लेकिन अग्नि में दी गई आहुति और दिया हुआ दान अपने पुण्यफल के रूप में स्थायी रहता है।
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4. नीतिवचनानि

संस्कृत श्लोक एवं हिंदी भावार्थ

🌸 संस्कृत श्लोक एवं हिंदी भावार्थ 🌸

प्रमुख संस्कृत श्लोकों का सरल हिंदी अनुवाद और भावार्थ

१. सम्पत्तौ च विपत्तौ च...

सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये यथा॥

हिंदी अनुवाद
जिस प्रकार सूर्य उदय होते समय भी लाल दिखाई देता है और अस्त होते समय भी लाल ही दिखाई देता है, उसी प्रकार महान लोगों का व्यवहार सुख-संपत्ति और दुख-विपत्ति दोनों परिस्थितियों में समान रहता है।
भावार्थ
महान व्यक्ति सुख मिलने पर घमंड नहीं करते और कठिन समय आने पर निराश नहीं होते। वे हर परिस्थिति में अपने स्वभाव और व्यवहार को समान रखते हैं।
२. यौवनं धनसम्पत्तिः...

यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्॥

हिंदी अनुवाद
यौवन, धन-संपत्ति, अधिकार और विवेकहीनता—इनमें से एक-एक भी मनुष्य के लिए अनर्थ का कारण बन सकता है। फिर जहाँ ये चारों एक साथ हों, वहाँ क्या होगा!
भावार्थ
युवावस्था, धन और शक्ति यदि विवेक के बिना मिल जाएँ तो व्यक्ति गलत रास्ते पर जा सकता है। इसलिए जीवन में धन और शक्ति के साथ विवेक और समझदारी बहुत आवश्यक है।
३. दातव्यमिति यद्दानम्...

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥

हिंदी अनुवाद
जो दान इस विचार से दिया जाता है कि दान करना हमारा कर्तव्य है, बदले में किसी प्रकार के उपकार की इच्छा किए बिना, उचित स्थान, उचित समय और योग्य व्यक्ति को दिया जाता है, उसे सात्त्विक दान कहा जाता है।
भावार्थ
दान हमेशा निःस्वार्थ भाव से, सही समय पर, सही स्थान पर और योग्य व्यक्ति को देना चाहिए। बदले में किसी लाभ की इच्छा रखना उचित नहीं है।
४. त्यजेदेकं कुलस्यार्थे...

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥

हिंदी अनुवाद
कुल के हित के लिए एक व्यक्ति का त्याग कर देना चाहिए। गाँव के हित के लिए कुल का त्याग कर देना चाहिए। देश के हित के लिए गाँव का त्याग कर देना चाहिए और आत्मकल्याण के लिए पूरी पृथ्वी का भी त्याग कर देना चाहिए।
भावार्थ
इस श्लोक में बताया गया है कि बड़े हित के लिए छोटे हित का त्याग करना चाहिए। व्यक्तिगत हित से परिवार, परिवार से समाज और समाज से देश का हित अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।
५. मित्रद्रोही कृतघ्नश्च...

मित्रद्रोही कृतघ्नश्च यश्च विश्वासघातकः।
ते नराः नरकं यान्ति यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥

हिंदी अनुवाद
जो व्यक्ति अपने मित्र के साथ विश्वासघात करता है, जो उपकार को भूल जाता है और जो किसी के विश्वास को तोड़ता है, ऐसे मनुष्य सूर्य और चंद्रमा के रहने तक नरक के समान दुख भोगते हैं।
भावार्थ
हमें अपने मित्रों के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए, दूसरों के उपकार को नहीं भूलना चाहिए और किसी के विश्वास को नहीं तोड़ना चाहिए। विश्वासघात और कृतघ्नता बहुत बुरे गुण हैं।
संस्कृत श्लोक • हिंदी अनुवाद • सरल भावार्थ

गुण स्वर सन्धिः

📚 गुण स्वर सन्धिः
कक्षा १० • संस्कृत व्याकरणम्

📖 गुण स्वर सन्धेः परिभाषा

अकारस्य अथवा आकारस्य इकारेण, ईकारेण, उकारेण, ऊकारेण अथवा ऋकारेण सह संयोगे क्रमशः ए, ओ, अर् इत्येते गुणस्वराः भवन्ति, सा गुण स्वर सन्धिः कथ्यते।

सरल रूप में: जब अ/आ के बाद इ/ई, उ/ऊ अथवा आता है, तो दोनों स्वरों के स्थान पर गुण स्वर ए, ओ, अर् हो जाते हैं।

🔵 १. अ/आ + इ/ई = ए

अ + इ = ए
अ + ई = ए
आ + इ = ए
आ + ई = ए
उदाहरण: देव + इन्द्र = देवेन्द्रः
नर + इन्द्र = नरेन्द्रः
महा + ईश्वर = महेश्वरः

🟢 २. अ/आ + उ/ऊ = ओ

अ + उ = ओ
अ + ऊ = ओ
आ + उ = ओ
आ + ऊ = ओ
उदाहरण: लोक + उपकार = लोकोपकारः
महा + उत्सव = महोत्सवः
पर + उपकार = परोपकारः

🟣 ३. अ/आ + ऋ = अर्

अ + ऋ = अर्
आ + ऋ = अर्
उदाहरण: देव + ऋषि = देवर्षिः
राज + ऋषि = राजर्षिः
महा + ऋषि = महर्षिः

🧠 सरल स्मरण सूत्र

अ/आ + इ/ई → ए

अ/आ + उ/ऊ → ओ

अ/आ + ऋ → अर्

याद रखें: इ/ई से , उ/ऊ से और ऋ से अर् बनता है।

📋 गुण स्वर सन्धिः — ५० उदाहरणानि

क्र. सन्धि-विच्छेदः सन्धिः वाक्यम्
देव + इन्द्र देवेन्द्रः देवेन्द्रः देवानां राजा अस्ति।
नर + इन्द्र नरेन्द्रः नरेन्द्रः प्रजाः पालयति।
सुर + इन्द्र सुरेन्द्रः सुरेन्द्रः देवानां नेतृत्वं करोति।
गण + ईश गणेशः गणेशः विघ्नान् निवारयति।
महा + ईश्वर महेश्वरः महेश्वरः शिवस्य नाम अस्ति।
परम + ईश्वर परमेश्वरः परमेश्वरः सर्वत्र वर्तते।
राज + इन्द्र राजेन्द्रः राजेन्द्रः सभां गच्छति।
सप्त + इन्द्रिय सप्तेन्द्रियः इन्द्रियाणि विषयान् गृह्णन्ति।
कवि + इन्द्र कवीन्द्रः कवीन्द्रः सुन्दरं काव्यं लिखति।
१० मुनि + इन्द्र मुनीन्द्रः मुनीन्द्रः तपस्यां करोति।
११ लोक + ईश लोकेशः लोकेशः सर्वेषां हितं चिन्तयति।
१२ राज + ईश्वर राजेश्वरः राजेश्वरः सभायां उपविष्टः।
१३ महा + उत्सव महोत्सवः विद्यालये महोत्सवः भवति।
१४ लोक + उपकार लोकोपकारः लोकोपकारः श्रेष्ठं कर्म अस्ति।
१५ पर + उपकार परोपकारः परोपकारः पुण्यं कार्यम् अस्ति।
१६ हित + उपदेश हितोपदेशः हितोपदेशः सर्वेषां हितकरः अस्ति।
१७ नर + उत्तम नरोत्तमः रामः नरोत्तमः आसीत्।
१८ पुरुष + उत्तम पुरुषोत्तमः रामः पुरुषोत्तमः कथ्यते।
१९ महा + उदय महौदयः देशस्य महौदयः अभवत्।
२० सूर्य + उदय सूर्योदयः प्रातः सूर्योदयः भवति।
२१ चन्द्र + उदय चन्द्रोदयः सायं चन्द्रोदयः भवति।
२२ जल + उदय जलोदयः सरोवरे जलोदयः दृश्यते।
२३ नव + उदय नवोदयः विद्यालयस्य नवोदयः अभवत्।
२४ ज्ञान + उदय ज्ञानोदयः अध्ययनेन ज्ञानोदयः भवति।
२५ आत्म + उन्नति आत्मोन्नतिः विद्यया आत्मोन्नतिः भवति।
२६ महा + ऋषि महर्षिः महर्षिः तपस्यां करोति।
२७ देव + ऋषि देवर्षिः देवर्षिः नारदः वीणां वादयति।
२८ राज + ऋषि राजर्षिः राजर्षिः जनहितं करोति।
२९ ब्रह्म + ऋषि ब्रह्मर्षिः ब्रह्मर्षिः ज्ञानं ददाति।
३० सप्त + ऋषि सप्तर्षयः आकाशे सप्तर्षयः दृश्यन्ते।
३१ देव + उपासना देवोपासना देवोपासना मनः शुद्धं करोति।
३२ ग्राम + उपकार ग्रामोपकारः ग्रामोपकारः सर्वैः करणीयः।
३३ धर्म + उपदेश धर्मोपदेशः धर्मोपदेशः जनान् मार्गदर्शयति।
३४ राज + उपवन राजोपवनम् राजोपवने पुष्पाणि सन्ति।
३५ जल + उपयोग जलोपयोगः जलोपयोगः सावधानतया करणीयः।
३६ महा + उपदेश महोपदेशः महोपदेशः जनानां मार्गदर्शकः अस्ति।
३७ महा + ऋतु महर्तुः महर्तुः प्रकृतेः शोभां वर्धयति।
३८ देव + उपहार देवोपहारः भक्तः देवोपहारं समर्पयति।
३९ नर + उपकार नरोपकारः नरोपकारः मानवस्य धर्मः अस्ति।
४० सर्व + उपकार सर्वोपकारः सर्वोपकारः पुण्यदायकः भवति।
४१ महा + ईश महेशः महेशः पूजां करोति।
४२ गण + ईश गणेशः गणेशः प्रथमं पूज्यते।
४३ कपि + ईश कपीशः कपीशः रामस्य भक्तः अस्ति।
४४ मुनि + ईश मुनीशः मुनीशः तपः करोति।
४५ परम + उपदेश परमोपदेशः परमोपदेशः सर्वेषां हितकरः अस्ति।
४६ हित + उपदेश हितोपदेशः हितोपदेशः जीवनस्य मार्गं दर्शयति।
४७ जन + उपकार जनोपकारः जनोपकारः श्रेष्ठं कार्यम् अस्ति।
४८ महा + उपकार महौपकारः तस्य महौपकारः स्मरणीयः अस्ति।
४९ नव + उत्साह नवोत्साहः छात्रेषु नवोत्साहः दृश्यते।
५० यथा + उचित यथोचितम् कार्यं यथोचितं करणीयम्।
📌 विशेष सूचना:
गुण स्वर सन्धौ अकारस्य अथवा आकारस्य परे इकारे/ईकारे , उकारे/ऊकारे तथा ऋकारे अर् आदेशः भवति।
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