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मम परिचय

मम परिचयः | संस्कृत में अपना परिचय | संस्कृत प्रश्न उत्तर

🌸 मम परिचयः 🌸

संस्कृत में अपना परिचय — सरल प्रश्नोत्तर

📚 विद्यार्थियों के लिए उपयोगी संस्कृत सम्भाषण

इस पाठ के माध्यम से विद्यार्थी संस्कृत भाषा में अपना नाम, आयु, जन्मदिवस, कक्षा, विद्यालय, परिवार, प्रिय विषय, मित्र तथा भविष्य के लक्ष्य के बारे में सरलता से परिचय देना सीख सकते हैं।

प्रश्नः — भवान्/भवती कः/का अस्ति?
उत्तरम् — अहं बालकः/बालिका अस्मि।
प्रश्नः — भवान्/भवती कः/का अस्ति?
उत्तरम् — अहं छात्रः/छात्रा अस्मि।
प्रश्नः — भवतः/भवत्याः नाम किम् अस्ति?
उत्तरम् — मम नाम __________ अस्ति।
प्रश्नः — भवान्/भवती कति वर्षीयः/वर्षीया अस्ति?
उत्तरम् — अहं __________ वर्षीयः/वर्षीया अस्मि।
दश / एकादश / द्वादश / त्रयोदश / चतुर्दश / पञ्चदश / षोडश
प्रश्नः — भवतः/भवत्याः जन्मदिवसः कदा भवति?
उत्तरम् — मम जन्मदिवसः मार्चमासे 20 दिनाङ्के भवति।
प्रश्नः — भवान्/भवती कस्याम् कक्षायाम् पठति?
उत्तरम् — अहं __________ कक्षायाम् पठामि।
षष्ठी / सप्तमी / अष्टमी / नवमी / दशमी
प्रश्नः — भवान्/भवती कस्मिन् विद्यालये पठति?
उत्तरम् — अहं ‘केंद्रीय विद्यालय ................. ’ इति विद्यालये पठामि।
प्रश्नः — भवतः/भवत्याः प्राचार्यस्य नाम किम् अस्ति?
उत्तरम् — अस्माकम् प्राचार्यस्य नाम ..................... महोदयः अस्ति।
प्रश्नः — भवान्/भवती किं पठति?
उत्तरम् — अहं संस्कृतं पठामि।
प्रश्नः — भवतः/भवत्याः प्रियः विषयः कः अस्ति?
उत्तरम् — मम प्रियः विषयः संस्कृतम् अस्ति।
प्रश्नः — भवान्/भवती प्रियः विषयः कः अस्ति?
उत्तरम् — मह्यम् संस्कृतं बहु रोचते।
मम प्रियः विषयः संस्कृतम् अस्ति।
प्रश्नः — भवान्/भवती कुत्र वसति?
उत्तरम् — अहं __________ नगरे/राज्ये वसामि।
प्रश्नः — भवतः/भवत्याः गृहे कति जनाः सन्ति?
उत्तरम् — मम गृहे पञ्च जनाः सन्ति।
त्रयः / चत्वारः / षट् / सप्त / अष्ट / नव / दश
प्रश्नः — भवतः/भवत्याः मातुः नाम किम् अस्ति?
उत्तरम् — मम मातुः नाम __________ अस्ति।
प्रश्नः — भवतः/भवत्याः पितुः नाम किम् अस्ति?
उत्तरम् — मम पितुः नाम __________ अस्ति।
प्रश्नः — भवतः/भवत्याः प्रियः सखा/प्रिया सखी कः/का अस्ति?
उत्तरम् — मम प्रियः सखा/प्रिया सखी __________ अस्ति।
प्रश्नः — भवतः/भवत्याः प्रियः वर्णः कः अस्ति?
उत्तरम् — मम प्रियः वर्णः __________ अस्ति।
रक्तः / पीतः / नीलः / श्वेतः / कृष्णः / पाटलः / केसरः
प्रश्नः — भवतः/भवत्याः प्रियः शिक्षकः/प्रिया शिक्षिका कः/का अस्ति?
उत्तरम् — मम प्रियः शिक्षकः/प्रिया शिक्षिका __________ अस्ति।
प्रश्नः — भवान्/भवती भविष्ये किम् भवितुम् इच्छति?
उत्तरम् — अहं भविष्ये शिक्षकः/शिक्षिका भवितुम् इच्छामि।
शिक्षकः – शिक्षिका चिकित्सकः – चिकित्सिका अभियन्ता – अभियन्त्री सैनिकः – सैनिकी नेता – नेत्री कृषकः – कृषिका लेखकः – लेखिका नर्तकः – नर्तकी आरक्षकः – आरक्षिका क्रीडकः – क्रीडिका
🌺 एषः मम संक्षिप्तः जीवनपरिचयः अस्ति। 🌺

🙏 धन्यवादः 🙏

🚩 संस्कृतं पठामः। संस्कृतं वदामः। 🚩

मम परिचयः — संस्कृत सम्भाषण

विद्यार्थियों के लिए सरल एवं उपयोगी संस्कृत सामग्री

11. आर्यभटः

आर्यभटः — संस्कृत पाठ का हिन्दी अनुवाद

महान गणितज्ञ एवं ज्योतिर्विद् आर्यभट का जीवन, सिद्धान्त और योगदान

पाठ का विषय: इस संस्कृत पाठ में महान भारतीय गणितज्ञ एवं ज्योतिर्विद् आर्यभट के जीवन, पृथ्वी की गति, ग्रहण के वैज्ञानिक कारण तथा गणित और ज्योतिष के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान का वर्णन किया गया है।

१. पृथ्वी की गति और सूर्य

पूर्वदिशायाम् उदेति सूर्यः पश्चिमदिशायां च अस्तं गच्छति इति दृश्यते हि लोके।
हिन्दी अर्थ: संसार में ऐसा दिखाई देता है कि सूर्य पूर्व दिशा में उदित होता है और पश्चिम दिशा में अस्त होता है।
परं न अनेन अवबोध्यमस्ति यत्सूर्यो गतिशील इति।
हिन्दी अर्थ: परन्तु केवल ऐसा दिखाई देने से यह समझना उचित नहीं है कि सूर्य गतिशील है।
सूर्योऽचलः पृथिवी तु चला या स्वकीये अक्षे घूर्णति इति साम्प्रतं सुस्थापितः सिद्धान्तः।
हिन्दी अर्थ: अब यह सिद्धान्त अच्छी तरह स्थापित हो चुका है कि सूर्य स्थिर है और पृथ्वी गतिशील है तथा वह अपनी धुरी पर घूमती है।
सिद्धान्तोऽयं प्रथमतया येन प्रवर्तितः, स आसीत् महान् गणितज्ञः ज्योतिर्विच्च आर्यभटः।
हिन्दी अर्थ: इस सिद्धान्त को सबसे पहले जिस महान गणितज्ञ एवं ज्योतिर्विद् ने प्रतिपादित किया, वे आर्यभट थे।
पृथिवी स्थिरा वर्तते इति परम्परा प्रचलिता रूढिः तेन प्रत्यादिष्टा।
हिन्दी अर्थ: उन्होंने पृथ्वी स्थिर है, इस प्रचलित परम्परागत धारणा का खण्डन किया।
तेन उदाहरणं दत्तं यद् गतिशीलायां नौकायाम् उपविष्टः मानवः नौकां स्थिराम् अनुभवति, अन्यान् च पदार्थान् गतिशीलान् अवगच्छति।
हिन्दी अर्थ: उन्होंने उदाहरण दिया कि गतिशील नाव में बैठा हुआ मनुष्य नाव को स्थिर अनुभव करता है और अन्य पदार्थों को गतिशील समझता है।
एवमेव गतिशीलायां पृथिव्याम् अवस्थितः मानवः पृथिवीं स्थिराम् अनुभवति सूर्यादिग्रहान् च गतिशीलान् वेत्ति।
हिन्दी अर्थ: इसी प्रकार गतिशील पृथ्वी पर स्थित मनुष्य पृथ्वी को स्थिर अनुभव करता है तथा सूर्य आदि ग्रहों को गतिशील समझता है।

२. आर्यभट का जन्म और आर्यभटीयम्

४७६ तमे ख्रीस्ताब्दे (षट्सप्तत्यधिकचतुःशतमे वर्षे) आर्यभटः जन्म लब्धवानिति तेनैव विरचिते आर्यभटीयम् इत्यस्मिन् ग्रन्थे उल्लिखितम्।
हिन्दी अर्थ: आर्यभट ने ४७६ ईस्वी में जन्म लिया था। इसका उल्लेख उनके द्वारा रचित ‘आर्यभटीयम्’ नामक ग्रन्थ में मिलता है।
ग्रन्थोऽयं तेन त्रयोविंशतितमे वयसि विरचितः।
हिन्दी अर्थ: यह ग्रन्थ उन्होंने तेईस वर्ष की आयु में लिखा था।
ऐतिहासिकस्रोतैः ज्ञायते यत् पाटलिपुत्रं निकषा आर्यभटस्य वेधशाला आसीत्।
हिन्दी अर्थ: ऐतिहासिक स्रोतों से ज्ञात होता है कि पाटलिपुत्र के निकट आर्यभट की वेधशाला थी।
अनेन इदम् अनुमीयते यत् तस्य कर्मभूमिः पाटलिपुत्रमेव आसीत्।
हिन्दी अर्थ: इससे अनुमान किया जाता है कि पाटलिपुत्र ही उनकी कर्मभूमि थी।

३. गणित और ज्योतिष के क्षेत्र में आर्यभट का योगदान

आर्यभटस्य योगदानं गणितज्योतिषे सम्बद्धं वर्तते यत्र संख्यानाम् आकलनं महत्त्वम् आदधाति।
हिन्दी अर्थ: आर्यभट का योगदान गणित-ज्योतिष के क्षेत्र से सम्बन्धित था, जहाँ संख्याओं की गणना का विशेष महत्त्व है।
आर्यभटः फलितज्योतिषशास्त्रे न विश्वसिति स्म।
हिन्दी अर्थ: आर्यभट फलित ज्योतिषशास्त्र में विश्वास नहीं करते थे।
गणितीयपद्धत्या कृतम् आकलनमाधृत्य एव तेन प्रतिपादितं यद् ग्रहणे राहु-केतुनामकौ दानवौ न स्तः कारणम्।
हिन्दी अर्थ: गणितीय पद्धति से की गई गणना के आधार पर उन्होंने प्रतिपादित किया कि ग्रहण का कारण राहु और केतु नामक दानव नहीं हैं।
तत्र तु सूर्यचन्द्रपृथिवी इति त्रीणि एव कारणानि।
हिन्दी अर्थ: बल्कि ग्रहण के पीछे सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी — ये तीन ही कारण हैं।
सूर्यं परितः भ्रमन्त्याः पृथिव्याः, चन्द्रस्य परिक्रमापथेन संयोगाद् ग्रहणं भवति।
हिन्दी अर्थ: सूर्य के चारों ओर घूमती हुई पृथ्वी और चन्द्रमा की परिक्रमा-पथ से सम्बन्धित स्थिति के कारण ग्रहण होता है।
यदा पृथिव्याः छायापातेन चन्द्रस्य प्रकाशः अवरुध्यते तदा चन्द्रग्रहणं भवति।
हिन्दी अर्थ: जब पृथ्वी की छाया पड़ने से चन्द्रमा का प्रकाश रुक जाता है, तब चन्द्रग्रहण होता है।
तथैव पृथ्वीसूर्योः मध्ये समागतस्य चन्द्रस्य छायापाते सूर्यग्रहणं दृश्यते।
हिन्दी अर्थ: इसी प्रकार जब चन्द्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है और उसकी छाया पड़ती है, तब सूर्यग्रहण दिखाई देता है।

४. आर्यभट के सिद्धान्तों का विरोध

समाजे नूतनानां विचाराणां स्वीकरणे प्रायः सामान्यजनाः काठिन्यमनुभवन्ति।
हिन्दी अर्थ: समाज में नए विचारों को स्वीकार करने में सामान्यतः लोगों को कठिनाई होती है।
भारतीयज्योतिःशास्त्रे तथैव आर्यभटस्यापि विरोधः अभवत्।
हिन्दी अर्थ: भारतीय ज्योतिषशास्त्र के क्षेत्र में इसी प्रकार आर्यभट का भी विरोध हुआ।
तस्य सिद्धान्ताः उपेक्षिताः।
हिन्दी अर्थ: उनके सिद्धान्तों की उपेक्षा की गई।
स पण्डितम्मन्यानां उपहासपात्रं जातः।
हिन्दी अर्थ: वे स्वयं को विद्वान मानने वाले लोगों के उपहास का पात्र बन गए।
पुनरपि तस्य दृष्टिः कालातिगामिनी दृष्टा।
हिन्दी अर्थ: फिर भी बाद में उनकी दूरदर्शी दृष्टि समय से बहुत आगे की मानी गई।
आधुनिकैः वैज्ञानिकैः तस्मिन् तस्य च सिद्धान्ते समादरः प्रकटितः।
हिन्दी अर्थ: आधुनिक वैज्ञानिकों ने उनके तथा उनके सिद्धान्तों के प्रति सम्मान प्रकट किया।
अस्मादेव कारणाद् अस्माकं प्रथमोपग्रहस्य नाम आर्यभट इति कृतम्।
हिन्दी अर्थ: इसी कारण हमारे प्रथम उपग्रह का नाम ‘आर्यभट’ रखा गया।

५. आर्यभट का महत्त्व

वस्तुतः भारतीयायाः गणितपरम्परायाः अथ च विज्ञानपरम्परायाः असौ एकः शिखरपुरुषः आसीत्।
हिन्दी अर्थ: वास्तव में वे भारतीय गणित परम्परा और विज्ञान परम्परा के एक महान शिखर पुरुष थे।
📚 पाठ का सार:
आर्यभट भारत के महान गणितज्ञ और ज्योतिर्विद् थे। उन्होंने पृथ्वी की गति, ग्रहण के वैज्ञानिक कारण तथा गणितीय गणना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। उनके वैज्ञानिक सिद्धान्त अपने समय से बहुत आगे थे। इसी महान योगदान के सम्मान में भारत के प्रथम उपग्रह का नाम ‘आर्यभट’ रखा गया।

10. सहजः स्वास्थ्यलाभः

आयुर्वेदीयौषधिगुणाः (Ayurvedic Medicinal Herbs) - Tulasi, Amalaki, Nimba, Haridra, Ardraka Translation & Explanation
🌿 आयुर्वेद • संस्कृत • हिंदी

आयुर्वेदीयौषधिगुणाः

📖 परिचय
नीचे प्रत्येक संस्कृत श्लोक का सरल और स्पष्ट हिंदी अनुवाद भी दिया गया है।
इस लेख में आयुर्वेद के प्रमुख औषधीय पौधों—तुलसी, आमलकम् (आँवला), निम्बः (नीम), हरिद्रा (हल्दी) और आर्द्रकम् (अदरक) के श्लोक, उनका पदच्छेद, अन्वय और विस्तृत हिंदी भावार्थ प्रस्तुत किया गया है।

1. तुलसी (Tulasi)

संस्कृत श्लोक तुलसी कटुका तिक्ता ह्युष्णा दाहपित्तकृत् ।
दीपनी कुष्ठकृच्छ्रास्त्रपार्वरुक्कफवातजित् ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
तुलसी कड़वी तथा तिक्त रस वाली और उष्ण प्रकृति की होती है। यह दाह एवं पित्त को बढ़ा सकती है तथा अग्नि को प्रदीप्त करती है। यह कुष्ठ, मूत्रकृच्छ्र, रक्तदोष, पार्श्वशूल तथा कफ-वात से उत्पन्न विकारों को दूर करने में उपयोगी मानी गई है।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
तुलसी कटुका तिक्ता हृद्या उष्णा दाह-पित्त-कृत् दीपनी कुष्ठ कृच्छ्रास्र-पार्श्वरुक् कफ वात जित्।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
तुलसी कटुका, तिक्ता, हृदया, उष्णाह् (च अस्ति)। सा दाहं पित्तं च करोति, दीपनी (च भवति)। सा कुष्ठ-कृच्छ्रास्र-पार्श्वरुक्-कफवातजित् (अस्ति)।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
तुलसी कटु (कड़वी) और तिक्त रस से संपन्न, उष्ण वीर्य वाली तथा हृदय के लिए हितकारी (हृद्या) होती है। उष्ण वीर्य होने के कारण यह जठराग्नि को प्रदीप्त करती है, अतः इसे 'दीपनी' कहा जाता है। यह कफ और वात का शमन करती हुई श्वास, काँसी तथा वात-कफ विकारों में हितकारी होती है। रक्तदोष, कुष्ठ, मूत्रकृच्छ्र, पार्श्वशूलादि (पसली का दर्द) रोगों में इसका उपयोग प्रशस्त है। उष्ण स्वभाव के कारण यह पित्त प्रकोप को भी उत्पन्न कर सकती है, अतः पित्त प्रधान प्रकृति वाले लोगों के लिए इसका मितसेवन (सीमित मात्रा में सेवन) अपेक्षित है।

2. आमलकम् - आँवला (Amalakam / Amla)

संस्कृत श्लोक हन्ति वातं तदम्लत्वात् पित्तं माधुर्यशैत्यतः ।
कफं रूक्षकषायत्वात्फलं धात्र्यास्त्रिदोषजित् ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
आँवले का फल अम्लता के कारण वात का, मधुरता और शीतलता के कारण पित्त का तथा रूक्ष और कषाय गुण के कारण कफ का शमन करता है। इसलिए आँवला त्रिदोषों को संतुलित करने वाला माना गया है।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
हन्ति वातम् तद्-अम्लत्वात् पित्तम् माधुर्य-शैत्यतः कफम् रूक्ष-कषायत्वात् धात्र्याः फलम् त्रिदोप-जित् (त्रिदोषजित्)।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
धात्र्याः फलं तत् अम्लत्वात् वातं हन्ति, माधुर्यशैत्यतः पित्तं (हन्ति), रूक्षकषायत्वात् कफं (हन्ति)। अतः धात्र्याः फलं त्रिदोषजित् (त्रिदोषजित्) (अस्ति)।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
धात्रीफलम् (आँवला) षड्रसयुक्त होने के कारण विशिष्ट महत्व रखता है। इसका प्रमुख अम्ल रस वात शमनाय कारण होता है। मधुर विपाकत्वात् तथा शीतवीर्यत्वात् पित्तदोष का प्रशमन होता है। कषाय रसप्रधानत्वेन रूक्षगुणेन च कफदोषोपि शमं याति। एवं परस्परविरुद्धगुणसमन्वितत्वात् धात्रीफलम् त्रिदोषहराणां द्रव्यांमध्ये श्रेष्ठत्वेन परिगण्यते। रसायनत्वात् च दीर्घायुष्य-बल-वर्ण-ओजः वर्धनाय प्रशस्यते।

3. निम्बः - नीम (Nimba / Neem)

संस्कृत श्लोक निम्बफलं रसे तिक्तं पाके तु कटुभेदनम् ।
स्निग्धं लघूष्णं कुष्ठघ्नं गुल्मार्शकृमिमेहजित् ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
नीम का फल रस में तिक्त (कड़वा) होता है और पाचन के बाद कटु प्रभाव वाला माना गया है। यह स्निग्ध, हल्का और उष्ण है तथा कुष्ठ, गुल्म, अर्श, कृमि और मेह आदि विकारों में उपयोगी बताया गया है।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
निम्बफलम् रसे तिक्तम् पाके तु कटुभेदनम् स्निग्धम् लघूष्णम् कुष्ठ-घ्नम् गुल्मार्शः-कृमि-मेह-जित्।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
निम्बफलं रसे तिक्तम्, पाके तु कटु तथा भेदनं (भवति)। (तत्) स्निग्धं, लघु, उष्णं, कुष्ठघ्नं, गुल्मार्श - कृमिमेहजित् (च भवति)।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
निम्बफल स्वभावतः तिक्तारसप्रधानं कटुविपाकयुक्तं च भवति। स्निग्धत्वेन वातस्य अतिप्रकोपं न करोति, उष्णवीर्यत्वेन च कफवातशमनं करोति। भेदनगुणयुक्तत्वात् मलसङ्गं निवारयति। तस्य कुष्ठ-गुल्म-अर्श-कृमि-प्रमेहादिषु विशेषोपयोगिता निर्दिष्टा अस्ति। अतः निम्बफलं दोषशोधनपूर्वकं रोगप्रशमनकारितवेन आयुर्वेदे प्रशस्यते।

4. हरिद्रा - हल्दी (Haridra / Turmeric)

संस्कृत श्लोक हरिद्रा कटुका तिक्ता रूक्षोष्णा कफपित्तनुत् ।
वर्ण्या त्वग्दोषमेहास्रशोथपाण्डुव्रणापहा ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
हल्दी कटु और तिक्त रस वाली, रूक्ष तथा उष्ण प्रकृति की होती है। यह कफ और पित्त का शमन करने वाली तथा वर्ण को निखारने वाली मानी गई है। यह त्वचा-विकार, मेह, रक्तदोष, सूजन, पाण्डुरोग और घावों में उपयोगी बताई गई है।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
हरिद्रा कटुका तिक्ता रूक्षोष्णा कफ-पित्त-नुत् वर्ण्या त्वक्-दोष-मेह-अस्र-शोथ-पाण्डु-व्रण-अपहा।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
हरिद्रा कटुका, तिक्ता, रूक्षा, उष्णाह् (उष्णा), कफपित्तनुत् (च अस्ति)। (सा) वर्ण्या (तथा च) त्वग्दोषमेहास्रशोथ - पाण्डुव्रणापहा (भवति)।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
हरिद्रा कटु-तिक्तारससंपन्ना, रूक्षगुणा उष्णवीर्या च भवति। कटु-तिक्तरसाभ्यां कफस्य शमनं करोति, उष्णवीर्येण स्तब्धतां शोथं च निवारयति। तस्याः रक्तप्रसादकत्वात् वर्ण्यत्वं प्रसिद्धम्। प्रमेह-त्वग्विकार-रक्तदोष-शोथ-पाण्डुरोग-व्रणेषु हरिद्रायाः विशिष्टोपयोगिता आयुर्वेदग्रन्थेषु प्रतिपादिता। व्रणशोधन-रोपणकर्मणि कुष्ठादिरोगेषु अपि हरिद्रा प्रशस्ता मन्यते।

5. आर्द्रकम् - अदरक (Ardrakam / Ginger)

संस्कृत श्लोक कटुका मधुरा पाके रूक्षा वातकफापहा ।
ये गुणाः कथिताः शुण्ठ्यास्तेऽपि सन्त्यर्द्रकेऽखिलाः ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
अदरक कटु रस वाला और पाचन के बाद मधुर विपाक वाला माना गया है। यह रूक्ष गुणयुक्त तथा वात और कफ का शमन करने वाला है। सोंठ के जो गुण बताए गए हैं, वे सभी गुण अदरक में भी पाए जाते हैं।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
कटुका मधुरा पाके रूक्षा वात-कफ-अपहा ये गुणाः कथिताः शुण्ठ्याः ते अपि सन्ति आर्द्रके अखिलाः।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
(शुण्ठी) कटुका मधुरा पाके रूक्षा वातकफापहा (च अस्ति)। ये गुणाः शुण्ठ्याः कथिताः, ते अखिलाः अपि (गुणाः) आर्द्रके सन्ति।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
अत्र आर्द्रकस्य गुणाः शुण्ठ्या समानाः एवेति निरूपिताः। यद्यपि आर्द्रकं शुण्ठ्याः पूर्वावस्था अस्ति, तथापि तयोः गुणास्तु समाना एव। आर्द्रकं कटुरसात्मकं, मधुरविपाकयुक्तं, रूक्षगुणप्रधानं, वातकफशामकं च भवति। अतः अग्निमान्ध्ये, अरुचौ, आमदोषे, कफप्रधानकास-श्वासयोः, ग्रहणीविकारादिषु चैतत् हितकरम्।
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