संस्कृत एवं हिंदी अनुवाद
शकः–कर्णः संवाद
सुसूक्ष्ममूला निपतन्ति पादपाः।
जलं जलस्थानगतं च शुष्यति।
हुतं च दत्तं च तथैव तिष्ठति॥
समय बीतने के साथ शिक्षा या ज्ञान का प्रभाव कम हो सकता है। बहुत गहरी जड़ों वाले पेड़ भी समय आने पर गिर जाते हैं। अपने स्थान पर स्थित जल भी धीरे-धीरे सूख जाता है। लेकिन अग्नि में दी गई आहुति और दिया हुआ दान अपने पुण्यफल के रूप में स्थायी रहता है।