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8. बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता

बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता
📚 संस्कृत अध्ययन सामग्री

सिंह और शृगाल की कथा

संस्कृत मूल पाठ • सरल हिंदी अनुवाद • श्लोक • भावार्थ • शिक्षाप्रद संदेश

सिंह और शृगाल की कथा

संस्कृत मूल पाठ
कस्मिंश्चित् वने खरनखरः नाम सिंहः प्रतिवसति स्म। सः कदाचित् इतस्ततः परिभ्रमन् क्षुधार्तः न किञ्चिदपि आहारं प्राप्तवान्। ततः सूर्यास्तसमये एकां महतीं गुहां दृष्ट्वा सः अचिन्तयत्— “नूनम् एतस्यां गुहायां रात्रौ कोऽपि जीवः आगच्छति। अतः अत्रैव निगूढो भूत्वा तिष्ठामि” इति।

एतस्मिन् अन्तरे गुहायाः स्वामी दधिपुच्छः नाम शृगालः समागच्छत्। स च यावत् पश्यति तावत् सिंहपदपद्धतिः गुहायां प्रविष्टा दृश्यते, न च बहिर्गता। शृगालः अचिन्तयत्— “अहो विनष्टोऽस्मि! नूनम् अस्मिन् बिले सिंहः अस्ति। तत् किं करवाणि?” एवं विचिन्त्य दूरस्थं रवं कृत्वा उवाच— “भो बिले! भो बिले! किं न स्मरसि, यन्मया त्वया सह समयः कृतोऽस्ति यत् यदाहं बाह्यात् प्रत्यागमिष्यामि तदा त्वं माम् आकारयिष्यसि? यदि त्वं मां न आह्वयसि तर्हि अहं द्वितीयं बिलं यास्यामि इति।”
सरल हिंदी अनुवाद
किसी वन में खरनखर नाम का एक सिंह रहता था। एक दिन वह इधर-उधर घूमता हुआ बहुत भूखा हो गया, लेकिन उसे कहीं भी भोजन नहीं मिला। तब सूर्यास्त के समय उसने एक बड़ी गुफा देखी। उसने सोचा— “निश्चय ही रात के समय कोई न कोई जीव इस गुफा में आता होगा। इसलिए मैं यहीं छिपकर बैठ जाता हूँ।”

इसी बीच उस गुफा का स्वामी दधिपुच्छ नाम का एक शृगाल वहाँ आ गया। उसने देखा कि गुफा के अंदर जाते हुए सिंह के पैरों के निशान तो हैं, लेकिन बाहर आने के निशान नहीं हैं। शृगाल ने सोचा— “अरे! मैं तो मारा गया। निश्चय ही इस गुफा में सिंह है। अब मैं क्या करूँ?”

यह सोचकर उसने दूर से आवाज लगाई— “हे गुफा! क्या तुम्हें याद नहीं कि मेरे और तुम्हारे बीच यह समझौता हुआ था कि जब मैं बाहर से वापस आऊँगा, तब तुम मुझे पुकारोगी? यदि तुम मुझे नहीं पुकारोगी, तो मैं दूसरी गुफा में चला जाऊँगा।”

सिंह की चतुराई और शृगाल का बचाव

संस्कृत मूल पाठ
अथ एतच्छ्रुत्वा सिंहः अचिन्तयत्— “नूनमेव गुहा स्वामिनः सदा समाह्वानं करोति। परन्तु मद्भयात् न किञ्चित् वदति।”

तदहम् अस्य आह्वानं करिष्यामि। एवं सः बिले प्रविश्य मे भोज्यं भविष्यति। इत्यं विचिन्त्य सिंहः सहसा शृगालस्य आह्वानमकरोत्। सिंहस्य उच्चगर्जन-प्रतिध्वनिना सा गुहा उच्चैः शृगालम् आह्वयत्। अनेन अन्येऽपि पशवः भयभीताः अभवन्। शृगालोऽपि ततः दूरं पलायमानः इममपठत्—
अनागतं यः कुरुते स शोभते, स शोच्यते यो न करोत्यनागतम्।
वनेऽत्र संस्थस्य समागता जरा, विलस्य वाणी न कदापि श्रुता॥
सरल हिंदी अनुवाद
यह सुनकर सिंह ने सोचा— “निश्चय ही यह गुफा अपने स्वामी को हमेशा पुकारती होगी। लेकिन मेरे डर के कारण यह कुछ नहीं कह रही है।”

सिंह ने सोचा— “मैं ही इसे पुकारता हूँ। इस प्रकार शृगाल गुफा के अंदर आ जाएगा और मेरा भोजन बन जाएगा।” ऐसा सोचकर सिंह ने जोर से शृगाल को पुकारा। सिंह की भयंकर गर्जना की प्रतिध्वनि से गुफा भी जोर से शृगाल को पुकारती हुई प्रतीत हुई। इससे दूसरे पशु भी डर गए। शृगाल भी वहाँ से बहुत दूर भाग गया।
श्लोक का भावार्थ
जो व्यक्ति आने वाले संकट के लिए पहले से उपाय कर लेता है, वही सुरक्षित रहता है। जो भविष्य में आने वाली विपत्ति के लिए कोई तैयारी नहीं करता, उसे बाद में पछताना पड़ता है। शृगाल ने अपनी बुद्धि और सावधानी से संकट को पहचान लिया और सिंह से बच गया।

🌿 शिक्षाप्रद संदेश

संकट के समय घबराने के बजाय बुद्धि, धैर्य और दूरदर्शिता से काम लेना चाहिए। भविष्य में आने वाली परिस्थितियों का अनुमान लगाकर पहले से तैयारी करना ही सच्ची बुद्धिमानी है।

🌿 संस्कृत अध्ययन सामग्री 🌿

वृद्धिः स्वर सन्धिः

📚 वृद्धिः स्वर-सन्धिः

कक्षा 10 संस्कृत व्याकरण

📖 वृद्धिः स्वर-सन्धेः परिभाषा

अथवा आ इत्येतयोः स्वरयोः पश्चात् ए, ऐ आगच्छति चेत् तयोः स्थाने भवति तथा च अथवा आ इत्येतयोः पश्चात् ओ, औ आगच्छति चेत् तयोः स्थाने भवति। एषा वृद्धिः स्वर-सन्धिः कथ्यते।

उदाहरणम् :
सदा + एव = सदैव
महा + औषधम् = महौषधम्

🔹 वृद्धिः स्वर-सन्धेः नियमाः

अ + ए = ऐ अ + ऐ = ऐ आ + ए = ऐ आ + ऐ = ऐ
अ + ओ = औ अ + औ = औ आ + ओ = औ आ + औ = औ

🧠 सरल-स्मरण सूत्र

अ / आ + ए / ऐ → ऐ

अ / आ + ओ / औ → औ

⭐ अर्थात् ए-ऐ के योग से तथा ओ-औ के योग से होता है।

📋 50 उदाहरणाः — सन्धि-विच्छेदः, सन्धिः तथा वाक्यम्

क्र. सन्धि-विच्छेदः सन्धिः वाक्यम्
सदा + एव सदैव सः सदैव सत्यं वदति।
तथा + एव तथैव सः तथैव कार्यं करोति।
यथा + एव यथैव यथैव कथितं तथा कुरु।
महा + ऐश्वर्यम् महैश्वर्यम् राज्ञः महैश्वर्यम् आसीत्।
परम + ऐक्यम् परमैक्यम् सर्वेषां परमैक्यम् आवश्यकम्।
लोक + ऐक्यम् लोकैक्यम् लोकैक्यं सर्वेषां हितकरम्।
जन + ऐक्यम् जनैक्यम् जनैक्येन देशः शक्तिमान् भवति।
महा + ऐश्वर्यम् महैश्वर्यम् सः महैश्वर्यं प्राप्तवान्।
सदा + एव सदैव विद्यार्थी सदैव पठति।
१० तथा + एव तथैव गुरुः तथैव उपदिशति।
११ जल + ओघः जलौघः नद्याः जलौघः प्रवहति।
१२ वन + औषधिः वनौषधिः वनौषधिः स्वास्थ्याय हितकरा।
१३ महा + औषधम् महौषधम् इदं महौषधम् अस्ति।
१४ महा + ओघः महौघः नद्याः महौघः दृश्यते।
१५ राज + आदेशः राजादेशः राजादेशः सर्वैः पाल्यते।
१६ लोक + ओपकारः लोकौपकारः लोकौपकारः पुण्यकार्यं भवति।
१७ महा + ओदार्यम् महौदार्यम् तस्य महौदार्यं प्रसिद्धम्।
१८ महा + औचित्यम् महौचित्यम् अस्य कार्यस्य महौचित्यम् अस्ति।
१९ परम + औषधम् परमौषधम् योगः परमौषधम् इव अस्ति।
२० ग्राम + ओघः ग्रामौघः ग्रामौघः उत्सवे मिलितः।
२१ महा + औत्सुक्यम् महौत्सुक्यम् बालकस्य महौत्सुक्यम् अस्ति।
२२ महा + ओजः महौजः वीरस्य महौजः दृश्यते।
२३ जन + औत्सुक्यम् जनौत्सुक्यम् जनौत्सुक्यं वर्धते।
२४ महा + औदार्यम् महौदार्यम् महौदार्यं सज्जनस्य भूषणम्।
२५ सदा + एव सदैव माता सदैव स्नेहं करोति।
२६ यथा + एव यथैव यथैव गुरुः वदति तथैव कुरु।
२७ तथा + एव तथैव सः तथैव आचरति।
२८ महा + ऐक्यम् महैक्यम् महैक्येन राष्ट्रं बलवत्तरं भवति।
२९ परम + ऐश्वर्यम् परमैश्वर्यम् ईश्वरस्य परमैश्वर्यम् अस्ति।
३० लोक + ऐक्यम् लोकैक्यम् लोकैक्यं शान्तेः आधारः।
३१ जन + ऐक्यम् जनैक्यम् जनैक्येन समस्या नश्यति।
३२ राज + ऐश्वर्यम् राजैश्वर्यम् राजैश्वर्यं क्षणभङ्गुरम्।
३३ परम + औदार्यम् परमौदार्यम् परमौदार्यं महत्त्वपूर्णम्।
३४ महा + औषधिः महौषधिः एषा महौषधिः अस्ति।
३५ जल + ओघः जलौघः वर्षायां जलौघः भवति।
३६ वन + ओषधिः वनौषधिः वनौषधिः उपयोगिनी अस्ति।
३७ महा + ओघः महौघः समुद्रे महौघः दृश्यते।
३८ महा + औत्सुक्यम् महौत्सुक्यम् छात्रेषु महौत्सुक्यम् अस्ति।
३९ महा + औचित्यम् महौचित्यम् अत्र महौचित्यम् अस्ति।
४० महा + ओजः महौजः सैनिकस्य महौजः अस्ति।
४१ सदा + एव सदैव सदैव परिश्रमः करणीयः।
४२ तथा + एव तथैव छात्राः तथैव लिखन्ति।
४३ यथा + एव यथैव यथैव वदति तथैव करोति।
४४ परम + ऐश्वर्यम् परमैश्वर्यम् ज्ञानं परमैश्वर्यम् अस्ति।
४५ महा + ऐश्वर्यम् महैश्वर्यम् तस्य महैश्वर्यं प्रसिद्धम्।
४६ लोक + ऐक्यम् लोकैक्यम् लोकैक्यं आवश्यकम्।
४७ महा + औदार्यम् महौदार्यम् सज्जनस्य महौदार्यं प्रशंसनीयम्।
४८ वन + औषधिः वनौषधिः वनौषधयः बहूपयोगिन्यः सन्ति।
४९ महा + औषधम् महौषधम् औषधं महौषधम् इव कार्यं करोति।
५० सदा + एव सदैव सदैव सत्यस्य विजयः भवति।

⭐ परीक्षायै महत्त्वपूर्णम्

अ / आ + ए / ऐ = ऐ
उदाहरणम् — सदा + एव = सदैव

अ / आ + ओ / औ = औ
उदाहरणम् — महा + औषधम् = महौषधम्

7. विद्यामहिमा

विद्यामहिमा

विद्यामहिमा

संस्कृत श्लोक • हिंदी अनुवाद • भावार्थ

(1)
संस्कृत श्लोक
न चौरहार्यं न च राजहार्यं,
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं,
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
हिंदी अनुवाद
विद्या रूपी धन को न तो चोर चुरा सकते हैं, न ही राजा उसे छीन सकता है। इसे भाइयों में बाँटना नहीं पड़ता और यह किसी प्रकार का बोझ भी नहीं बनता। बल्कि इसे खर्च करने पर यह हर दिन बढ़ता ही जाता है। इसलिए विद्या का धन सभी धनों में श्रेष्ठ है।
भावार्थ
संसार के अन्य धन को चुराया या छीना जा सकता है, लेकिन विद्या ऐसा धन है जिसे कोई चुरा नहीं सकता। इसे जितना दूसरों को बाँटते हैं, उतना ही हमारा ज्ञान बढ़ता है। इसलिए विद्या को सभी प्रकार के धन से श्रेष्ठ माना गया है।
(2)
संस्कृत श्लोक
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥
हिंदी अनुवाद
विद्या मनुष्य को विनय प्रदान करती है। विनय से मनुष्य योग्य बनता है। योग्यता से उसे धन की प्राप्ति होती है। धन से वह धर्म के कार्य करता है और धर्म से अंत में उसे सुख की प्राप्ति होती है।
भावार्थ
इस श्लोक में विद्या के महत्व को बताया गया है। विद्या से मनुष्य में नम्रता आती है। नम्रता से योग्यता प्राप्त होती है और योग्यता से धन मिलता है। धन का सदुपयोग करने से धर्म की प्राप्ति होती है और धर्म के मार्ग पर चलने से जीवन में सच्चा सुख प्राप्त होता है।
(3)
संस्कृत श्लोक
अपूर्वः कोऽपि कोशोऽयं विद्यते तव भारति।
व्ययतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति सञ्चयात्॥
हिंदी अनुवाद
हे भारती! तुम्हारे पास एक ऐसा अद्भुत खजाना है जो संसार में कहीं और नहीं मिलता। यह ऐसा धन है जो खर्च करने पर बढ़ता है और जमा करके रखने पर कम हो जाता है।
भावार्थ
यहाँ विद्या को एक अद्भुत खजाना कहा गया है। सामान्य धन को खर्च करने से वह कम होता है, लेकिन विद्या को दूसरों के साथ बाँटने और उसका उपयोग करने से वह और अधिक बढ़ती है। इसलिए ज्ञान को केवल अपने तक सीमित न रखकर दूसरों को भी देना चाहिए।
(4)
संस्कृत श्लोक
विद्वत्त्वं च नृपत्वं च नैव तुल्ये कदाचन।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते॥
हिंदी अनुवाद
विद्वान होना और राजा होना कभी भी समान नहीं हो सकते। राजा केवल अपने देश में सम्मानित होता है, जबकि विद्वान व्यक्ति सभी स्थानों पर सम्मानित होता है।
भावार्थ
इस श्लोक में विद्या और विद्वान के महत्व को बताया गया है। राजा को अपने राज्य में ही सम्मान प्राप्त होता है, लेकिन विद्वान व्यक्ति को किसी एक स्थान तक सीमित सम्मान नहीं मिलता। वह अपने ज्ञान और बुद्धि के कारण संपूर्ण संसार में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। इसलिए विद्वत्ता राजपद से भी श्रेष्ठ मानी गई है।
(5)
संस्कृत श्लोक
किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनः।
अकुलीनोऽपि विद्यावान् देवैरपि स पूज्यते॥
हिंदी अनुवाद
जिस मनुष्य के पास विद्या नहीं है, उसके लिए बड़े और प्रतिष्ठित कुल में जन्म लेने का क्या लाभ है? इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति छोटे या सामान्य कुल में जन्म लेकर भी विद्वान होता है, तो देवता भी उसका सम्मान करते हैं।
भावार्थ
इस श्लोक का भाव यह है कि केवल ऊँचे और प्रतिष्ठित कुल में जन्म लेना ही महत्वपूर्ण नहीं है। यदि मनुष्य विद्या से रहित है, तो उसका कुलीन होना भी व्यर्थ है। इसके विपरीत सामान्य कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति यदि विद्वान है, तो उसे सभी सम्मान देते हैं। अतः उच्च कुल में जन्म लेने की अपेक्षा विद्या अधिक महत्वपूर्ण है।
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