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11. आर्यभटः

आर्यभटः — संस्कृत पाठ का हिन्दी अनुवाद

महान गणितज्ञ एवं ज्योतिर्विद् आर्यभट का जीवन, सिद्धान्त और योगदान

पाठ का विषय: इस संस्कृत पाठ में महान भारतीय गणितज्ञ एवं ज्योतिर्विद् आर्यभट के जीवन, पृथ्वी की गति, ग्रहण के वैज्ञानिक कारण तथा गणित और ज्योतिष के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान का वर्णन किया गया है।

१. पृथ्वी की गति और सूर्य

पूर्वदिशायाम् उदेति सूर्यः पश्चिमदिशायां च अस्तं गच्छति इति दृश्यते हि लोके।
हिन्दी अर्थ: संसार में ऐसा दिखाई देता है कि सूर्य पूर्व दिशा में उदित होता है और पश्चिम दिशा में अस्त होता है।
परं न अनेन अवबोध्यमस्ति यत्सूर्यो गतिशील इति।
हिन्दी अर्थ: परन्तु केवल ऐसा दिखाई देने से यह समझना उचित नहीं है कि सूर्य गतिशील है।
सूर्योऽचलः पृथिवी तु चला या स्वकीये अक्षे घूर्णति इति साम्प्रतं सुस्थापितः सिद्धान्तः।
हिन्दी अर्थ: अब यह सिद्धान्त अच्छी तरह स्थापित हो चुका है कि सूर्य स्थिर है और पृथ्वी गतिशील है तथा वह अपनी धुरी पर घूमती है।
सिद्धान्तोऽयं प्रथमतया येन प्रवर्तितः, स आसीत् महान् गणितज्ञः ज्योतिर्विच्च आर्यभटः।
हिन्दी अर्थ: इस सिद्धान्त को सबसे पहले जिस महान गणितज्ञ एवं ज्योतिर्विद् ने प्रतिपादित किया, वे आर्यभट थे।
पृथिवी स्थिरा वर्तते इति परम्परा प्रचलिता रूढिः तेन प्रत्यादिष्टा।
हिन्दी अर्थ: उन्होंने पृथ्वी स्थिर है, इस प्रचलित परम्परागत धारणा का खण्डन किया।
तेन उदाहरणं दत्तं यद् गतिशीलायां नौकायाम् उपविष्टः मानवः नौकां स्थिराम् अनुभवति, अन्यान् च पदार्थान् गतिशीलान् अवगच्छति।
हिन्दी अर्थ: उन्होंने उदाहरण दिया कि गतिशील नाव में बैठा हुआ मनुष्य नाव को स्थिर अनुभव करता है और अन्य पदार्थों को गतिशील समझता है।
एवमेव गतिशीलायां पृथिव्याम् अवस्थितः मानवः पृथिवीं स्थिराम् अनुभवति सूर्यादिग्रहान् च गतिशीलान् वेत्ति।
हिन्दी अर्थ: इसी प्रकार गतिशील पृथ्वी पर स्थित मनुष्य पृथ्वी को स्थिर अनुभव करता है तथा सूर्य आदि ग्रहों को गतिशील समझता है।

२. आर्यभट का जन्म और आर्यभटीयम्

४७६ तमे ख्रीस्ताब्दे (षट्सप्तत्यधिकचतुःशतमे वर्षे) आर्यभटः जन्म लब्धवानिति तेनैव विरचिते आर्यभटीयम् इत्यस्मिन् ग्रन्थे उल्लिखितम्।
हिन्दी अर्थ: आर्यभट ने ४७६ ईस्वी में जन्म लिया था। इसका उल्लेख उनके द्वारा रचित ‘आर्यभटीयम्’ नामक ग्रन्थ में मिलता है।
ग्रन्थोऽयं तेन त्रयोविंशतितमे वयसि विरचितः।
हिन्दी अर्थ: यह ग्रन्थ उन्होंने तेईस वर्ष की आयु में लिखा था।
ऐतिहासिकस्रोतैः ज्ञायते यत् पाटलिपुत्रं निकषा आर्यभटस्य वेधशाला आसीत्।
हिन्दी अर्थ: ऐतिहासिक स्रोतों से ज्ञात होता है कि पाटलिपुत्र के निकट आर्यभट की वेधशाला थी।
अनेन इदम् अनुमीयते यत् तस्य कर्मभूमिः पाटलिपुत्रमेव आसीत्।
हिन्दी अर्थ: इससे अनुमान किया जाता है कि पाटलिपुत्र ही उनकी कर्मभूमि थी।

३. गणित और ज्योतिष के क्षेत्र में आर्यभट का योगदान

आर्यभटस्य योगदानं गणितज्योतिषे सम्बद्धं वर्तते यत्र संख्यानाम् आकलनं महत्त्वम् आदधाति।
हिन्दी अर्थ: आर्यभट का योगदान गणित-ज्योतिष के क्षेत्र से सम्बन्धित था, जहाँ संख्याओं की गणना का विशेष महत्त्व है।
आर्यभटः फलितज्योतिषशास्त्रे न विश्वसिति स्म।
हिन्दी अर्थ: आर्यभट फलित ज्योतिषशास्त्र में विश्वास नहीं करते थे।
गणितीयपद्धत्या कृतम् आकलनमाधृत्य एव तेन प्रतिपादितं यद् ग्रहणे राहु-केतुनामकौ दानवौ न स्तः कारणम्।
हिन्दी अर्थ: गणितीय पद्धति से की गई गणना के आधार पर उन्होंने प्रतिपादित किया कि ग्रहण का कारण राहु और केतु नामक दानव नहीं हैं।
तत्र तु सूर्यचन्द्रपृथिवी इति त्रीणि एव कारणानि।
हिन्दी अर्थ: बल्कि ग्रहण के पीछे सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी — ये तीन ही कारण हैं।
सूर्यं परितः भ्रमन्त्याः पृथिव्याः, चन्द्रस्य परिक्रमापथेन संयोगाद् ग्रहणं भवति।
हिन्दी अर्थ: सूर्य के चारों ओर घूमती हुई पृथ्वी और चन्द्रमा की परिक्रमा-पथ से सम्बन्धित स्थिति के कारण ग्रहण होता है।
यदा पृथिव्याः छायापातेन चन्द्रस्य प्रकाशः अवरुध्यते तदा चन्द्रग्रहणं भवति।
हिन्दी अर्थ: जब पृथ्वी की छाया पड़ने से चन्द्रमा का प्रकाश रुक जाता है, तब चन्द्रग्रहण होता है।
तथैव पृथ्वीसूर्योः मध्ये समागतस्य चन्द्रस्य छायापाते सूर्यग्रहणं दृश्यते।
हिन्दी अर्थ: इसी प्रकार जब चन्द्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है और उसकी छाया पड़ती है, तब सूर्यग्रहण दिखाई देता है।

४. आर्यभट के सिद्धान्तों का विरोध

समाजे नूतनानां विचाराणां स्वीकरणे प्रायः सामान्यजनाः काठिन्यमनुभवन्ति।
हिन्दी अर्थ: समाज में नए विचारों को स्वीकार करने में सामान्यतः लोगों को कठिनाई होती है।
भारतीयज्योतिःशास्त्रे तथैव आर्यभटस्यापि विरोधः अभवत्।
हिन्दी अर्थ: भारतीय ज्योतिषशास्त्र के क्षेत्र में इसी प्रकार आर्यभट का भी विरोध हुआ।
तस्य सिद्धान्ताः उपेक्षिताः।
हिन्दी अर्थ: उनके सिद्धान्तों की उपेक्षा की गई।
स पण्डितम्मन्यानां उपहासपात्रं जातः।
हिन्दी अर्थ: वे स्वयं को विद्वान मानने वाले लोगों के उपहास का पात्र बन गए।
पुनरपि तस्य दृष्टिः कालातिगामिनी दृष्टा।
हिन्दी अर्थ: फिर भी बाद में उनकी दूरदर्शी दृष्टि समय से बहुत आगे की मानी गई।
आधुनिकैः वैज्ञानिकैः तस्मिन् तस्य च सिद्धान्ते समादरः प्रकटितः।
हिन्दी अर्थ: आधुनिक वैज्ञानिकों ने उनके तथा उनके सिद्धान्तों के प्रति सम्मान प्रकट किया।
अस्मादेव कारणाद् अस्माकं प्रथमोपग्रहस्य नाम आर्यभट इति कृतम्।
हिन्दी अर्थ: इसी कारण हमारे प्रथम उपग्रह का नाम ‘आर्यभट’ रखा गया।

५. आर्यभट का महत्त्व

वस्तुतः भारतीयायाः गणितपरम्परायाः अथ च विज्ञानपरम्परायाः असौ एकः शिखरपुरुषः आसीत्।
हिन्दी अर्थ: वास्तव में वे भारतीय गणित परम्परा और विज्ञान परम्परा के एक महान शिखर पुरुष थे।
📚 पाठ का सार:
आर्यभट भारत के महान गणितज्ञ और ज्योतिर्विद् थे। उन्होंने पृथ्वी की गति, ग्रहण के वैज्ञानिक कारण तथा गणितीय गणना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। उनके वैज्ञानिक सिद्धान्त अपने समय से बहुत आगे थे। इसी महान योगदान के सम्मान में भारत के प्रथम उपग्रह का नाम ‘आर्यभट’ रखा गया।

10. सहजः स्वास्थ्यलाभः

आयुर्वेदीयौषधिगुणाः (Ayurvedic Medicinal Herbs) - Tulasi, Amalaki, Nimba, Haridra, Ardraka Translation & Explanation
🌿 आयुर्वेद • संस्कृत • हिंदी

आयुर्वेदीयौषधिगुणाः

📖 परिचय
नीचे प्रत्येक संस्कृत श्लोक का सरल और स्पष्ट हिंदी अनुवाद भी दिया गया है।
इस लेख में आयुर्वेद के प्रमुख औषधीय पौधों—तुलसी, आमलकम् (आँवला), निम्बः (नीम), हरिद्रा (हल्दी) और आर्द्रकम् (अदरक) के श्लोक, उनका पदच्छेद, अन्वय और विस्तृत हिंदी भावार्थ प्रस्तुत किया गया है।

1. तुलसी (Tulasi)

संस्कृत श्लोक तुलसी कटुका तिक्ता ह्युष्णा दाहपित्तकृत् ।
दीपनी कुष्ठकृच्छ्रास्त्रपार्वरुक्कफवातजित् ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
तुलसी कड़वी तथा तिक्त रस वाली और उष्ण प्रकृति की होती है। यह दाह एवं पित्त को बढ़ा सकती है तथा अग्नि को प्रदीप्त करती है। यह कुष्ठ, मूत्रकृच्छ्र, रक्तदोष, पार्श्वशूल तथा कफ-वात से उत्पन्न विकारों को दूर करने में उपयोगी मानी गई है।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
तुलसी कटुका तिक्ता हृद्या उष्णा दाह-पित्त-कृत् दीपनी कुष्ठ कृच्छ्रास्र-पार्श्वरुक् कफ वात जित्।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
तुलसी कटुका, तिक्ता, हृदया, उष्णाह् (च अस्ति)। सा दाहं पित्तं च करोति, दीपनी (च भवति)। सा कुष्ठ-कृच्छ्रास्र-पार्श्वरुक्-कफवातजित् (अस्ति)।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
तुलसी कटु (कड़वी) और तिक्त रस से संपन्न, उष्ण वीर्य वाली तथा हृदय के लिए हितकारी (हृद्या) होती है। उष्ण वीर्य होने के कारण यह जठराग्नि को प्रदीप्त करती है, अतः इसे 'दीपनी' कहा जाता है। यह कफ और वात का शमन करती हुई श्वास, काँसी तथा वात-कफ विकारों में हितकारी होती है। रक्तदोष, कुष्ठ, मूत्रकृच्छ्र, पार्श्वशूलादि (पसली का दर्द) रोगों में इसका उपयोग प्रशस्त है। उष्ण स्वभाव के कारण यह पित्त प्रकोप को भी उत्पन्न कर सकती है, अतः पित्त प्रधान प्रकृति वाले लोगों के लिए इसका मितसेवन (सीमित मात्रा में सेवन) अपेक्षित है।

2. आमलकम् - आँवला (Amalakam / Amla)

संस्कृत श्लोक हन्ति वातं तदम्लत्वात् पित्तं माधुर्यशैत्यतः ।
कफं रूक्षकषायत्वात्फलं धात्र्यास्त्रिदोषजित् ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
आँवले का फल अम्लता के कारण वात का, मधुरता और शीतलता के कारण पित्त का तथा रूक्ष और कषाय गुण के कारण कफ का शमन करता है। इसलिए आँवला त्रिदोषों को संतुलित करने वाला माना गया है।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
हन्ति वातम् तद्-अम्लत्वात् पित्तम् माधुर्य-शैत्यतः कफम् रूक्ष-कषायत्वात् धात्र्याः फलम् त्रिदोप-जित् (त्रिदोषजित्)।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
धात्र्याः फलं तत् अम्लत्वात् वातं हन्ति, माधुर्यशैत्यतः पित्तं (हन्ति), रूक्षकषायत्वात् कफं (हन्ति)। अतः धात्र्याः फलं त्रिदोषजित् (त्रिदोषजित्) (अस्ति)।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
धात्रीफलम् (आँवला) षड्रसयुक्त होने के कारण विशिष्ट महत्व रखता है। इसका प्रमुख अम्ल रस वात शमनाय कारण होता है। मधुर विपाकत्वात् तथा शीतवीर्यत्वात् पित्तदोष का प्रशमन होता है। कषाय रसप्रधानत्वेन रूक्षगुणेन च कफदोषोपि शमं याति। एवं परस्परविरुद्धगुणसमन्वितत्वात् धात्रीफलम् त्रिदोषहराणां द्रव्यांमध्ये श्रेष्ठत्वेन परिगण्यते। रसायनत्वात् च दीर्घायुष्य-बल-वर्ण-ओजः वर्धनाय प्रशस्यते।

3. निम्बः - नीम (Nimba / Neem)

संस्कृत श्लोक निम्बफलं रसे तिक्तं पाके तु कटुभेदनम् ।
स्निग्धं लघूष्णं कुष्ठघ्नं गुल्मार्शकृमिमेहजित् ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
नीम का फल रस में तिक्त (कड़वा) होता है और पाचन के बाद कटु प्रभाव वाला माना गया है। यह स्निग्ध, हल्का और उष्ण है तथा कुष्ठ, गुल्म, अर्श, कृमि और मेह आदि विकारों में उपयोगी बताया गया है।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
निम्बफलम् रसे तिक्तम् पाके तु कटुभेदनम् स्निग्धम् लघूष्णम् कुष्ठ-घ्नम् गुल्मार्शः-कृमि-मेह-जित्।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
निम्बफलं रसे तिक्तम्, पाके तु कटु तथा भेदनं (भवति)। (तत्) स्निग्धं, लघु, उष्णं, कुष्ठघ्नं, गुल्मार्श - कृमिमेहजित् (च भवति)।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
निम्बफल स्वभावतः तिक्तारसप्रधानं कटुविपाकयुक्तं च भवति। स्निग्धत्वेन वातस्य अतिप्रकोपं न करोति, उष्णवीर्यत्वेन च कफवातशमनं करोति। भेदनगुणयुक्तत्वात् मलसङ्गं निवारयति। तस्य कुष्ठ-गुल्म-अर्श-कृमि-प्रमेहादिषु विशेषोपयोगिता निर्दिष्टा अस्ति। अतः निम्बफलं दोषशोधनपूर्वकं रोगप्रशमनकारितवेन आयुर्वेदे प्रशस्यते।

4. हरिद्रा - हल्दी (Haridra / Turmeric)

संस्कृत श्लोक हरिद्रा कटुका तिक्ता रूक्षोष्णा कफपित्तनुत् ।
वर्ण्या त्वग्दोषमेहास्रशोथपाण्डुव्रणापहा ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
हल्दी कटु और तिक्त रस वाली, रूक्ष तथा उष्ण प्रकृति की होती है। यह कफ और पित्त का शमन करने वाली तथा वर्ण को निखारने वाली मानी गई है। यह त्वचा-विकार, मेह, रक्तदोष, सूजन, पाण्डुरोग और घावों में उपयोगी बताई गई है।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
हरिद्रा कटुका तिक्ता रूक्षोष्णा कफ-पित्त-नुत् वर्ण्या त्वक्-दोष-मेह-अस्र-शोथ-पाण्डु-व्रण-अपहा।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
हरिद्रा कटुका, तिक्ता, रूक्षा, उष्णाह् (उष्णा), कफपित्तनुत् (च अस्ति)। (सा) वर्ण्या (तथा च) त्वग्दोषमेहास्रशोथ - पाण्डुव्रणापहा (भवति)।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
हरिद्रा कटु-तिक्तारससंपन्ना, रूक्षगुणा उष्णवीर्या च भवति। कटु-तिक्तरसाभ्यां कफस्य शमनं करोति, उष्णवीर्येण स्तब्धतां शोथं च निवारयति। तस्याः रक्तप्रसादकत्वात् वर्ण्यत्वं प्रसिद्धम्। प्रमेह-त्वग्विकार-रक्तदोष-शोथ-पाण्डुरोग-व्रणेषु हरिद्रायाः विशिष्टोपयोगिता आयुर्वेदग्रन्थेषु प्रतिपादिता। व्रणशोधन-रोपणकर्मणि कुष्ठादिरोगेषु अपि हरिद्रा प्रशस्ता मन्यते।

5. आर्द्रकम् - अदरक (Ardrakam / Ginger)

संस्कृत श्लोक कटुका मधुरा पाके रूक्षा वातकफापहा ।
ये गुणाः कथिताः शुण्ठ्यास्तेऽपि सन्त्यर्द्रकेऽखिलाः ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
अदरक कटु रस वाला और पाचन के बाद मधुर विपाक वाला माना गया है। यह रूक्ष गुणयुक्त तथा वात और कफ का शमन करने वाला है। सोंठ के जो गुण बताए गए हैं, वे सभी गुण अदरक में भी पाए जाते हैं।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
कटुका मधुरा पाके रूक्षा वात-कफ-अपहा ये गुणाः कथिताः शुण्ठ्याः ते अपि सन्ति आर्द्रके अखिलाः।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
(शुण्ठी) कटुका मधुरा पाके रूक्षा वातकफापहा (च अस्ति)। ये गुणाः शुण्ठ्याः कथिताः, ते अखिलाः अपि (गुणाः) आर्द्रके सन्ति।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
अत्र आर्द्रकस्य गुणाः शुण्ठ्या समानाः एवेति निरूपिताः। यद्यपि आर्द्रकं शुण्ठ्याः पूर्वावस्था अस्ति, तथापि तयोः गुणास्तु समाना एव। आर्द्रकं कटुरसात्मकं, मधुरविपाकयुक्तं, रूक्षगुणप्रधानं, वातकफशामकं च भवति। अतः अग्निमान्ध्ये, अरुचौ, आमदोषे, कफप्रधानकास-श्वासयोः, ग्रहणीविकारादिषु चैतत् हितकरम्।

9. ऋतुः वसन्तः

ऋतुः वसन्तः

ऋतुराजः वसन्तः

परिचय (Introduction): प्रस्तुत पाठ में प्रकृति के राजा 'वसंत ऋतु' के आगमन, उसके सौंदर्य, प्राकृतिक उपादानों (फूल, भौरे, नदियाँ, वृक्ष और लताएँ) तथा प्रकृति में होने वाले मनमोहक परिवर्तनों का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है। आइए इसका पंक्ति-दर-पंक्ति हिंदी अनुवाद देखें।

🌿 गद्यांश 1: वसंत का स्वागत एवं प्रकृति का उल्लास

वाक्य 1
स्वागतं ते ऋतुराज ! त्वमेव कुसुमाकरः।
हिंदी अनुवाद
हे ऋतुराज (ऋतुओं के राजा वसंत)! तुम्हारा स्वागत है! तुम ही कुसुमाकर (फूलों की खान/ऋतुराज) हो।
वाक्य 2
तवागमने भवति पुष्पाणां विकासः, सौरभाणां च प्रसारः।
हिंदी अनुवाद
तुम्हारे आगमन पर फूलों का विकास (खिलना) होता है और सुगंधों (सौरभ) का प्रसार होता है।
वाक्य 3
अतः तव आगमनं सर्वान् जनान् आनन्दयति, निखिलान् प्राणिनः प्रीणयति, चराचरं च रमयति।
हिंदी अनुवाद
अतः तुम्हारा आगमन सभी मनुष्यों को आनंदित करता है, संपूर्ण प्राणियों को प्रसन्न करता है और चराचर (स्थावर और जंगम) जगत को रमणीय (सुखद) बनाता है।
वाक्य 4
इदानीं जडता विलीयते, मलिनता अपगता भवति, स्वच्छता एव दृश्यते परितः।
हिंदी अनुवाद
अब सर्दी की जडता (सुस्ती) विलीन हो जाती है, गंदगी दूर हो जाती है, और चारों तरफ स्वच्छता ही दिखाई देती है।

🌊 गद्यांश 2: निर्मल आकाश, नदियाँ और कमल वन

वाक्य 5
पश्यतु मनाक् निर्मलम् आकाशम्।
हिंदी अनुवाद
देखो, ज़रा देखो—आकाश कितना निर्मल (स्वच्छ) है।
वाक्य 6
स्वच्छाः दिशः प्रसन्ना इव भान्ति अद्य।
हिंदी अनुवाद
आज दिशाएँ स्वच्छ और प्रसन्न सी प्रतीत हो रही हैं।
वाक्य 7
सर्वत्र तडागेषु नदीषु कुल्यासु सरसु च राजते विमलं वारि।
हिंदी अनुवाद
सभी जगह तालाबों, नदियों, नहरों और झीलों में निर्मल जल शोभायमान हो रहा है।
वाक्य 8
क्वचित् मुकुलितानि अपरत्र प्रफुल्लितानि कमलवनानि।
हिंदी अनुवाद
कहीं कलियों से युक्त और कहीं पूरी तरह खिले हुए कमलों के वन सुशोभित हो रहे हैं।
वाक्य 9
विकसितानां पङ्कजानां शोभा कस्य मनो न हरति !
हिंदी अनुवाद
खिले हुए कमलों की यह शोभा किसके मन को नहीं हर लेती (मोहित नहीं करती)!

🐝 गद्यांश 3: वनों की शोभा, भौरे, कोयल और लताएँ

वाक्य 10
वनेषु, वाटिकासु, उद्यानेषु च नानावर्णाणि पुष्पाणि शोभन्ते।
हिंदी अनुवाद
वनों, बगीचों और उद्यानों में भाँति-भाँति के रंगों वाले फूल शोभा दे रहे हैं।
वाक्य 11
पुष्पाणामुपरि गुञ्जन्ति भ्रमराः।
हिंदी अनुवाद
फूलों के ऊपर भौरे गूंज (गुंजन) कर रहे हैं।
वाक्य 12
ते च प्रियाभिः सह सानन्दं मधूनि पिबन्ति, मधुना मत्तः पिको मधुरं कूजति, तदीयं ध्वनिं बालकाः अनुकुर्वन्ति।
हिंदी अनुवाद
और वे अपनी प्रियाओं के साथ आनंदपूर्वक मकरंद (मधु) पीते हैं। मधु (परागण/मदिरा) से मतवाला हुआ कोयल मीठा कूकता है, और उसकी इस ध्वनि का अनुकरण (नकल) बालक करते हैं।
वाक्य 13
वृक्षेषु नवपल्लवाः विराजन्ते। आम्रेषु मञ्जरीः संलग्नाः।
हिंदी अनुवाद
पेड़ों पर नए कोमल पत्ते (नवपल्लव) शोभा पा रहे हैं। आमों के पेड़ों पर बौर (मञ्जरी) लग गई हैं।
वाक्य 14
कुसुमितं सहकारमाश्रित्य लता प्रमुदिता। रसाले सङ्गता लता लोकानां मनांसि हरति।
हिंदी अनुवाद
फूलों से लदे हुए आम के पेड़ का आश्रय लेकर लता प्रमुदित (प्रसन्न) हो जाती है। आम के पेड़ से लिपटी हुई यह लता लोगों के मन को मोह लेती है।
वाक्य 15
पक्षिणां कलकूजनमपि सर्वेषां सुखदं भवति।
हिंदी अनुवाद
पक्षियों का मधुर कलकूजन भी सभी के लिए सुखद होता है।

🌸 गद्यांश 4: भौरों का मधुपान और प्रेम

वाक्य 16
अद्यत्वे मधुतः आधिक्यम्; पुष्पेषु मधूनि भवन्ति, मञ्जरीषु च भवन्ति।
हिंदी अनुवाद
इन दिनों शहद (मकरंद) की अधिकता होती है; फूलों में और आम की मंजरी में मधु होता है।
वाक्य 17
मधुनि, मधुने लोलुपाः चञ्चरीकाः यदा प्रमादं कुर्वन्ति तदा तेषां पक्षाः संसक्ता भवन्ति, मधुना संशलिष्टतया ते कदाचित् उड्डयितुं न पारयन्ति।
हिंदी अनुवाद
शहद के प्रति अत्यधिक लालची (लोलुप) भौरे जब असावधानी (प्रमाद) करते हैं, तब उनके पंख चिपक जाते हैं। मधु से आपस में चिपक जाने के कारण वे कभी-कभी उड़ने में असमर्थ हो जाते हैं।
वाक्य 18
तथापि मधुनि तादृशः स्वादः भवति येन ते ततो न विरमन्ति, अपि तु अनवरतं तत्र स्वानुरागं प्रकटयन्ति।
हिंदी अनुवाद
फिर भी, उस शहद में ऐसा अद्भुत स्वाद होता है कि वे उससे विरत (दूर) नहीं होते, बल्कि निरंतर उसके प्रति अपना प्रेम (स्वानुराग) प्रकट करते रहते हैं।

🌬️ गद्यांश 5: सरसों के फूल और मन्द पवन

वाक्य 19
सर्षपः पीतं वसनं दधानः प्रकटयति वासन्तिकं विलासम।
हिंदी अनुवाद
सरसों का पौधा पीले रंग का वस्त्र धारण किए हुए वसंत की सुंदरता (विलास) को प्रकट कर रहा है।
वाक्य 20
पुष्पेभ्यः सौरभं, वारिभ्यः शीतलतां चादाय प्रवहति मन्दः पवनः।
हिंदी अनुवाद
फूलों से सुगंध और जल से शीतलता लेकर मन्द-मन्द हवा बह रही है।
वाक्य 21
पवनेन आन्दोलिता मन्दं मन्दं कम्पमाना लता नर्त्कीव नृत्यन्ती प्रतीयते।
हिंदी अनुवाद
हवा से हिलती हुई और धीरे-धीरे काँपती हुई लता ऐसी प्रतीत होती है मानो कोई नर्तकी (नृत्य करने वाली) नृत्य कर रही हो।

💃 गद्यांश 6: प्रकृति का उल्लास और सबका आनंद

वाक्य 22
अस्मिन् समये प्रमुदिताः सर्वे जनाः समूहं रचयित्वा प्रकृतिशोभां पश्यन्तः भ्रमन्ति।
हिंदी अनुवाद
इस समय सभी प्रसन्न लोग समूह बनाकर प्रकृति की शोभा देखते हुए घूमते हैं।
वाक्य 23
उद्यानेषु, वाटिकासु, नदीतटेषु च क्वचित् गायन्ति लोकाः। अपरत्र नृत्यन्ति कूर्दन्ति च बालकाः।
हिंदी अनुवाद
उद्यानों, बगीचों और नदी के तटों पर कहीं लोग गाते हैं। दूसरी ओर बालक नाचते और कूदते हैं।
वाक्य 24
न केवलं मानवाः एव अपि तु पशवः पक्षिणः चापि प्रमुदिताः भवन्ति वसन्ते।
हिंदी अनुवाद
वसंत ऋतु में केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु और पक्षी भी अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
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