संस्कृत मूल पाठ
कस्मिंश्चित् वने खरनखरः नाम सिंहः प्रतिवसति स्म। सः कदाचित् इतस्ततः
परिभ्रमन् क्षुधार्तः न किञ्चिदपि आहारं प्राप्तवान्। ततः सूर्यास्तसमये
एकां महतीं गुहां दृष्ट्वा सः अचिन्तयत्— “नूनम् एतस्यां गुहायां रात्रौ
कोऽपि जीवः आगच्छति। अतः अत्रैव निगूढो भूत्वा तिष्ठामि” इति।
एतस्मिन् अन्तरे गुहायाः स्वामी दधिपुच्छः नाम शृगालः समागच्छत्।
स च यावत् पश्यति तावत् सिंहपदपद्धतिः गुहायां प्रविष्टा दृश्यते,
न च बहिर्गता। शृगालः अचिन्तयत्— “अहो विनष्टोऽस्मि! नूनम् अस्मिन्
बिले सिंहः अस्ति। तत् किं करवाणि?” एवं विचिन्त्य दूरस्थं रवं कृत्वा
उवाच— “भो बिले! भो बिले! किं न स्मरसि, यन्मया त्वया सह समयः कृतोऽस्ति
यत् यदाहं बाह्यात् प्रत्यागमिष्यामि तदा त्वं माम् आकारयिष्यसि?
यदि त्वं मां न आह्वयसि तर्हि अहं द्वितीयं बिलं यास्यामि इति।”
सरल हिंदी अनुवाद
किसी वन में खरनखर नाम का एक सिंह रहता था। एक दिन वह इधर-उधर
घूमता हुआ बहुत भूखा हो गया, लेकिन उसे कहीं भी भोजन नहीं मिला। तब सूर्यास्त के
समय उसने एक बड़ी गुफा देखी। उसने सोचा— “निश्चय ही रात के समय कोई न कोई जीव
इस गुफा में आता होगा। इसलिए मैं यहीं छिपकर बैठ जाता हूँ।”
इसी बीच उस गुफा का स्वामी दधिपुच्छ नाम का एक शृगाल वहाँ आ गया।
उसने देखा कि गुफा के अंदर जाते हुए सिंह के पैरों के निशान तो हैं, लेकिन बाहर
आने के निशान नहीं हैं। शृगाल ने सोचा— “अरे! मैं तो मारा गया। निश्चय ही इस
गुफा में सिंह है। अब मैं क्या करूँ?”
यह सोचकर उसने दूर से आवाज लगाई— “हे गुफा! क्या तुम्हें याद नहीं कि मेरे और
तुम्हारे बीच यह समझौता हुआ था कि जब मैं बाहर से वापस आऊँगा, तब तुम मुझे पुकारोगी?
यदि तुम मुझे नहीं पुकारोगी, तो मैं दूसरी गुफा में चला जाऊँगा।”
२
सिंह की चतुराई और शृगाल का बचाव
संस्कृत मूल पाठ
अथ एतच्छ्रुत्वा सिंहः अचिन्तयत्— “नूनमेव गुहा स्वामिनः सदा समाह्वानं
करोति। परन्तु मद्भयात् न किञ्चित् वदति।”
तदहम् अस्य आह्वानं करिष्यामि। एवं सः बिले प्रविश्य मे भोज्यं भविष्यति।
इत्यं विचिन्त्य सिंहः सहसा शृगालस्य आह्वानमकरोत्। सिंहस्य
उच्चगर्जन-प्रतिध्वनिना सा गुहा उच्चैः शृगालम् आह्वयत्। अनेन अन्येऽपि
पशवः भयभीताः अभवन्। शृगालोऽपि ततः दूरं पलायमानः इममपठत्—
अनागतं यः कुरुते स शोभते, स शोच्यते यो न करोत्यनागतम्।
वनेऽत्र संस्थस्य समागता जरा, विलस्य वाणी न कदापि श्रुता॥
सरल हिंदी अनुवाद
यह सुनकर सिंह ने सोचा— “निश्चय ही यह गुफा अपने स्वामी को हमेशा पुकारती होगी।
लेकिन मेरे डर के कारण यह कुछ नहीं कह रही है।”
सिंह ने सोचा— “मैं ही इसे पुकारता हूँ। इस प्रकार शृगाल गुफा के अंदर आ जाएगा
और मेरा भोजन बन जाएगा।” ऐसा सोचकर सिंह ने जोर से शृगाल को पुकारा। सिंह की
भयंकर गर्जना की प्रतिध्वनि से गुफा भी जोर से शृगाल को पुकारती हुई प्रतीत हुई।
इससे दूसरे पशु भी डर गए। शृगाल भी वहाँ से बहुत दूर भाग गया।
श्लोक का भावार्थ
जो व्यक्ति आने वाले संकट के लिए पहले से उपाय कर लेता है, वही सुरक्षित रहता है।
जो भविष्य में आने वाली विपत्ति के लिए कोई तैयारी नहीं करता, उसे बाद में पछताना
पड़ता है। शृगाल ने अपनी बुद्धि और सावधानी से संकट को पहचान लिया और सिंह से बच गया।
🌿 शिक्षाप्रद संदेश
संकट के समय घबराने के बजाय बुद्धि, धैर्य और दूरदर्शिता से काम लेना चाहिए।
भविष्य में आने वाली परिस्थितियों का अनुमान लगाकर पहले से तैयारी करना ही सच्ची बुद्धिमानी है।
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संस्कृत के साथ पंक्ति-दर-पंक्ति हिंदी अनुवाद
प्रत्येक संस्कृत वाक्य के ठीक नीचे उसका सरल हिंदी अर्थ दिया गया है,
जिससे विद्यार्थियों को पढ़ने और समझने में आसानी हो।
1कस्मिंश्चित् वने खरनखरः नाम सिंहः प्रतिवसति स्म।
↳किसी वन में खरनखर नाम का एक सिंह रहता था।
2सः कदाचित् इतस्ततः परिभ्रमन् क्षुधार्तः न किञ्चिदपि आहारं प्राप्तवान्।
↳एक दिन वह इधर-उधर घूमता हुआ बहुत भूखा हो गया, लेकिन उसे कहीं भी भोजन नहीं मिला।
3ततः सूर्यास्तसमये एकां महतीं गुहां दृष्ट्वा सः अचिन्तयत्—
↳तब सूर्यास्त के समय उसने एक बड़ी गुफा देखी और सोचा—
4नूनम् एतस्यां गुहायां रात्रौ कोऽपि जीवः आगच्छति।
↳निश्चय ही रात के समय कोई न कोई जीव इस गुफा में आता होगा।
5अतः अत्रैव निगूढो भूत्वा तिष्ठामि इति।
↳इसलिए मैं यहीं छिपकर बैठ जाता हूँ।
6एतस्मिन् अन्तरे गुहायाः स्वामी दधिपुच्छः नाम शृगालः समागच्छत्।
↳इसी बीच उस गुफा का स्वामी दधिपुच्छ नाम का एक शृगाल वहाँ आ गया।
7स च यावत् पश्यति तावत् सिंहपदपद्धतिः गुहायां प्रविष्टा दृश्यते, न च बहिर्गता।
↳उसने देखा कि गुफा के अंदर जाते हुए सिंह के पैरों के निशान तो हैं, लेकिन बाहर आने के निशान नहीं हैं।
8शृगालः अचिन्तयत्— अहो विनष्टोऽस्मि!
↳शृगाल ने सोचा— अरे! मैं तो मारा गया!
9नूनम् अस्मिन् बिले सिंहः अस्ति। तत् किं करवाणि?
↳निश्चय ही इस गुफा में सिंह है। अब मैं क्या करूँ?
10एवं विचिन्त्य दूरस्थं रवं कृत्वा उवाच— भो बिले! भो बिले!
↳ऐसा सोचकर उसने दूर से आवाज लगाई— हे गुफा! हे गुफा!
11किं न स्मरसि, यन्मया त्वया सह समयः कृतोऽस्ति?
↳क्या तुम्हें याद नहीं है कि मेरे और तुम्हारे बीच एक समझौता हुआ था?
12यदाहं बाह्यात् प्रत्यागमिष्यामि तदा त्वं माम् आकारयिष्यसि।
↳कि जब मैं बाहर से वापस आऊँगा, तब तुम मुझे पुकारोगी।
13यदि त्वं मां न आह्वयसि तर्हि अहं द्वितीयं बिलं यास्यामि इति।
↳यदि तुम मुझे नहीं पुकारोगी, तो मैं दूसरी गुफा में चला जाऊँगा।
14अथ एतच्छ्रुत्वा सिंहः अचिन्तयत्— नूनमेव गुहा स्वामिनः सदा समाह्वानं करोति।
↳यह सुनकर सिंह ने सोचा— निश्चय ही यह गुफा अपने स्वामी को हमेशा पुकारती होगी।
15परन्तु मद्भयात् न किञ्चित् वदति।
↳लेकिन मेरे डर के कारण यह कुछ नहीं कह रही है।
16तदहम् अस्य आह्वानं करिष्यामि।
↳इसलिए मैं ही इसे पुकारता हूँ।
17एवं सः बिले प्रविश्य मे भोज्यं भविष्यति।
↳इस प्रकार शृगाल गुफा के अंदर आ जाएगा और मेरा भोजन बन जाएगा।
18इत्यं विचिन्त्य सिंहः सहसा शृगालस्य आह्वानमकरोत्।
↳ऐसा सोचकर सिंह ने अचानक शृगाल को पुकारा।
19सिंहस्य उच्चगर्जनप्रतिध्वनिना सा गुहा उच्चैः शृगालम् आह्वयत्।
↳सिंह की भयंकर गर्जना की प्रतिध्वनि से गुफा भी जोर से शृगाल को पुकारती हुई प्रतीत हुई।
20अनेन अन्येऽपि पशवः भयभीताः अभवन्।
↳इससे दूसरे पशु भी डर गए।
21शृगालोऽपि ततः दूरं पलायमानः इममपठत्—
↳शृगाल भी वहाँ से बहुत दूर भाग गया और उसने यह कहा—
22अनागतं यः कुरुते स शोभते, स शोच्यते यो न करोत्यनागतम्।
↳जो व्यक्ति आने वाली परिस्थिति के लिए पहले से तैयारी कर लेता है, वही बुद्धिमान कहलाता है; जो आने वाली परिस्थिति के लिए उपाय नहीं करता, उसे बाद में पछताना पड़ता है।
23वनेऽत्र संस्थस्य समागता जरा, विलस्य वाणी न कदापि श्रुता॥
↳इस वन में रहने वाले के लिए संकट आ सकता है; केवल गुफा की बातों पर विश्वास करके निश्चिंत नहीं रहना चाहिए।