विद्यामहिमा
संस्कृत श्लोक • हिंदी अनुवाद • भावार्थ
(1)
संस्कृत श्लोक
न चौरहार्यं न च राजहार्यं,
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं,
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
न चौरहार्यं न च राजहार्यं,
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं,
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
हिंदी अनुवाद
विद्या रूपी धन को न तो चोर चुरा सकते हैं, न ही राजा उसे छीन सकता है। इसे भाइयों में बाँटना नहीं पड़ता और यह किसी प्रकार का बोझ भी नहीं बनता। बल्कि इसे खर्च करने पर यह हर दिन बढ़ता ही जाता है। इसलिए विद्या का धन सभी धनों में श्रेष्ठ है।
विद्या रूपी धन को न तो चोर चुरा सकते हैं, न ही राजा उसे छीन सकता है। इसे भाइयों में बाँटना नहीं पड़ता और यह किसी प्रकार का बोझ भी नहीं बनता। बल्कि इसे खर्च करने पर यह हर दिन बढ़ता ही जाता है। इसलिए विद्या का धन सभी धनों में श्रेष्ठ है।
भावार्थ
संसार के अन्य धन को चुराया या छीना जा सकता है, लेकिन विद्या ऐसा धन है जिसे कोई चुरा नहीं सकता। इसे जितना दूसरों को बाँटते हैं, उतना ही हमारा ज्ञान बढ़ता है। इसलिए विद्या को सभी प्रकार के धन से श्रेष्ठ माना गया है।
संसार के अन्य धन को चुराया या छीना जा सकता है, लेकिन विद्या ऐसा धन है जिसे कोई चुरा नहीं सकता। इसे जितना दूसरों को बाँटते हैं, उतना ही हमारा ज्ञान बढ़ता है। इसलिए विद्या को सभी प्रकार के धन से श्रेष्ठ माना गया है।
(2)
संस्कृत श्लोक
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥
हिंदी अनुवाद
विद्या मनुष्य को विनय प्रदान करती है। विनय से मनुष्य योग्य बनता है। योग्यता से उसे धन की प्राप्ति होती है। धन से वह धर्म के कार्य करता है और धर्म से अंत में उसे सुख की प्राप्ति होती है।
विद्या मनुष्य को विनय प्रदान करती है। विनय से मनुष्य योग्य बनता है। योग्यता से उसे धन की प्राप्ति होती है। धन से वह धर्म के कार्य करता है और धर्म से अंत में उसे सुख की प्राप्ति होती है।
भावार्थ
इस श्लोक में विद्या के महत्व को बताया गया है। विद्या से मनुष्य में नम्रता आती है। नम्रता से योग्यता प्राप्त होती है और योग्यता से धन मिलता है। धन का सदुपयोग करने से धर्म की प्राप्ति होती है और धर्म के मार्ग पर चलने से जीवन में सच्चा सुख प्राप्त होता है।
इस श्लोक में विद्या के महत्व को बताया गया है। विद्या से मनुष्य में नम्रता आती है। नम्रता से योग्यता प्राप्त होती है और योग्यता से धन मिलता है। धन का सदुपयोग करने से धर्म की प्राप्ति होती है और धर्म के मार्ग पर चलने से जीवन में सच्चा सुख प्राप्त होता है।
(3)
संस्कृत श्लोक
अपूर्वः कोऽपि कोशोऽयं विद्यते तव भारति।
व्ययतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति सञ्चयात्॥
अपूर्वः कोऽपि कोशोऽयं विद्यते तव भारति।
व्ययतो वृद्धिमायाति क्षयमायाति सञ्चयात्॥
हिंदी अनुवाद
हे भारती! तुम्हारे पास एक ऐसा अद्भुत खजाना है जो संसार में कहीं और नहीं मिलता। यह ऐसा धन है जो खर्च करने पर बढ़ता है और जमा करके रखने पर कम हो जाता है।
हे भारती! तुम्हारे पास एक ऐसा अद्भुत खजाना है जो संसार में कहीं और नहीं मिलता। यह ऐसा धन है जो खर्च करने पर बढ़ता है और जमा करके रखने पर कम हो जाता है।
भावार्थ
यहाँ विद्या को एक अद्भुत खजाना कहा गया है। सामान्य धन को खर्च करने से वह कम होता है, लेकिन विद्या को दूसरों के साथ बाँटने और उसका उपयोग करने से वह और अधिक बढ़ती है। इसलिए ज्ञान को केवल अपने तक सीमित न रखकर दूसरों को भी देना चाहिए।
यहाँ विद्या को एक अद्भुत खजाना कहा गया है। सामान्य धन को खर्च करने से वह कम होता है, लेकिन विद्या को दूसरों के साथ बाँटने और उसका उपयोग करने से वह और अधिक बढ़ती है। इसलिए ज्ञान को केवल अपने तक सीमित न रखकर दूसरों को भी देना चाहिए।
(4)
संस्कृत श्लोक
विद्वत्त्वं च नृपत्वं च नैव तुल्ये कदाचन।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते॥
विद्वत्त्वं च नृपत्वं च नैव तुल्ये कदाचन।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते॥
हिंदी अनुवाद
विद्वान होना और राजा होना कभी भी समान नहीं हो सकते। राजा केवल अपने देश में सम्मानित होता है, जबकि विद्वान व्यक्ति सभी स्थानों पर सम्मानित होता है।
विद्वान होना और राजा होना कभी भी समान नहीं हो सकते। राजा केवल अपने देश में सम्मानित होता है, जबकि विद्वान व्यक्ति सभी स्थानों पर सम्मानित होता है।
भावार्थ
इस श्लोक में विद्या और विद्वान के महत्व को बताया गया है। राजा को अपने राज्य में ही सम्मान प्राप्त होता है, लेकिन विद्वान व्यक्ति को किसी एक स्थान तक सीमित सम्मान नहीं मिलता। वह अपने ज्ञान और बुद्धि के कारण संपूर्ण संसार में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। इसलिए विद्वत्ता राजपद से भी श्रेष्ठ मानी गई है।
इस श्लोक में विद्या और विद्वान के महत्व को बताया गया है। राजा को अपने राज्य में ही सम्मान प्राप्त होता है, लेकिन विद्वान व्यक्ति को किसी एक स्थान तक सीमित सम्मान नहीं मिलता। वह अपने ज्ञान और बुद्धि के कारण संपूर्ण संसार में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। इसलिए विद्वत्ता राजपद से भी श्रेष्ठ मानी गई है।
(5)
संस्कृत श्लोक
किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनः।
अकुलीनोऽपि विद्यावान् देवैरपि स पूज्यते॥
किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनः।
अकुलीनोऽपि विद्यावान् देवैरपि स पूज्यते॥
हिंदी अनुवाद
जिस मनुष्य के पास विद्या नहीं है, उसके लिए बड़े और प्रतिष्ठित कुल में जन्म लेने का क्या लाभ है? इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति छोटे या सामान्य कुल में जन्म लेकर भी विद्वान होता है, तो देवता भी उसका सम्मान करते हैं।
जिस मनुष्य के पास विद्या नहीं है, उसके लिए बड़े और प्रतिष्ठित कुल में जन्म लेने का क्या लाभ है? इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति छोटे या सामान्य कुल में जन्म लेकर भी विद्वान होता है, तो देवता भी उसका सम्मान करते हैं।
भावार्थ
इस श्लोक का भाव यह है कि केवल ऊँचे और प्रतिष्ठित कुल में जन्म लेना ही महत्वपूर्ण नहीं है। यदि मनुष्य विद्या से रहित है, तो उसका कुलीन होना भी व्यर्थ है। इसके विपरीत सामान्य कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति यदि विद्वान है, तो उसे सभी सम्मान देते हैं। अतः उच्च कुल में जन्म लेने की अपेक्षा विद्या अधिक महत्वपूर्ण है।
इस श्लोक का भाव यह है कि केवल ऊँचे और प्रतिष्ठित कुल में जन्म लेना ही महत्वपूर्ण नहीं है। यदि मनुष्य विद्या से रहित है, तो उसका कुलीन होना भी व्यर्थ है। इसके विपरीत सामान्य कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति यदि विद्वान है, तो उसे सभी सम्मान देते हैं। अतः उच्च कुल में जन्म लेने की अपेक्षा विद्या अधिक महत्वपूर्ण है।