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6. न गड्गदत्तः पुनरेति कूपम्

न गड्गदत्तः पुनरेति कूपम् — संस्कृत एवं हिंदी अनुवाद

न गड्गदत्तः पुनरेति कूपम्

संस्कृत कथा • सरल हिंदी अनुवाद

कथा का प्रारम्भ
संस्कृत
गड्गदत्तः अभ्यतः विविधैः वृक्षैः सुशोभिताः ग्रामाः आसन्। तत्र एकस्मात् ग्रामात् बहिः वृक्षस्य अधः एकः जीर्णः कूपः आसीत्। तस्मिन् कूपे मण्डूकानाम् अधिपतिः गड्गदत्तः परिजनेः सह निवसति स्म।
हिंदी अनुवाद
गड्गदत्त नाम का एक मेंढक था। उसके आसपास अनेक प्रकार के वृक्षों से सुंदर गाँव बसे हुए थे। एक गाँव के बाहर एक वृक्ष के नीचे एक पुराना कुआँ था। उस कुएँ में मेंढकों का राजा गड्गदत्त अपने परिवार और संबंधियों के साथ रहता था।
संस्कृत
तस्य दुर्व्यवहारेण कैश्चित् प्रमुखाः भेकाः रुष्टाः जाताः। ते गड्गदत्तम् अधिकरणं हीनं कृत्वा कूपात् बहिः कर्तुम् उद्यताः अभवन्। तत् ज्ञात्वा गड्गदत्तः विवादम् अनुभवति स्म।
हिंदी अनुवाद
उसके बुरे व्यवहार के कारण कुछ प्रमुख मेंढक उससे नाराज़ हो गए। वे गड्गदत्त को उसके पद से हटाकर कुएँ से बाहर निकालने के लिए तैयार हो गए। यह बात जानकर गड्गदत्त को बहुत चिंता हुई और उसे विवाद का सामना करना पड़ा।
गड्गदत्त की योजना
संस्कृत
‘शत्रूणां नाशः कथं भवेत्’ इति एकान्ते चातुकारैः सह मन्त्रणाम् अकरोत्। एकः नष्टबुद्धिः नाम मण्डूकः तं अकथयत्— ‘नीतिः विना किमपि न सिध्यति। शत्रुः शत्रूणां नाशयितव्यः इति नीतिः। एषः शत्रूणां नाशाय सर्पः सहायकः भविष्यति, यः वृक्षस्य कोटरे निवसति एवं सगृह्य विनैः शत्रूनाशः भविष्यति।’
हिंदी अनुवाद
उसने अकेले में अपने कुछ सलाहकारों के साथ विचार किया कि “शत्रुओं का नाश कैसे किया जाए?” उनमें एक मूर्ख मेंढक ने कहा— “नीति के बिना कोई काम सफल नहीं होता। शत्रुओं का नाश करना चाहिए। आपके शत्रुओं को नष्ट करने में एक साँप सहायक हो सकता है। वह वृक्ष के एक खोखले स्थान में रहता है। उसकी सहायता से आपके शत्रुओं का नाश हो सकता है।”
साँप के पास जाना
संस्कृत
ततः मूढः गड्गदत्तः कूपात् बहिः आगत्य सर्पस्य समीपं गतः। सः सर्पः सादरम् उच्चैः अवदत्— “नागरराजाय नमः!”
हिंदी अनुवाद
तब मूर्ख गड्गदत्त कुएँ से बाहर आया और साँप के पास गया। उसने साँप को आदरपूर्वक ऊँची आवाज़ में कहा— “नागराज को प्रणाम!”
संस्कृत
विषधरः अवदत्— “क्वायातं सखे? किं ते प्रियं करवाणि? किमर्थम् आगतः असि?”
हिंदी अनुवाद
साँप ने पूछा— “मित्र! तुम कहाँ से आए हो? मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ? तुम यहाँ किस उद्देश्य से आए हो?”
संस्कृत
गड्गदत्तः अवदत्— “त्वया सह मैत्रीं कर्तुं तव द्वारम् उपागतः।”
हिंदी अनुवाद
गड्गदत्त ने कहा— “मैं आपके साथ मित्रता करने के लिए आपके पास आया हूँ।”
संस्कृत
सर्पराजः तम् अपृच्छत्— “भक्ष्यभक्षकयोः मध्ये कैदृशी मैत्री?” गड्गदत्तः अकथयत्— “सत्यम्, परम अधुना अपमानितः अहं तव साहाय्यम् अभिलषामि।”
हिंदी अनुवाद
साँपों के राजा ने उससे पूछा— “भक्षक और भक्ष्य के बीच कैसी मित्रता?” गड्गदत्त ने कहा— “यह बात सही है, लेकिन इस समय मैं अपमानित हुआ हूँ। इसलिए मैं आपकी सहायता चाहता हूँ।”
साँप से सहायता की माँग
संस्कृत
सर्पः — कस्मात् ते परिभवः?
हिंदी अनुवाद
साँप — तुम्हारा अपमान किस कारण हुआ?
संस्कृत
गड्गदत्तः — स्वजनैः।
हिंदी अनुवाद
गड्गदत्त — अपने ही संबंधियों के कारण।
संस्कृत
सर्पः — क्व ते निवासः? वाप्यां कूपे तडागे वा?
हिंदी अनुवाद
साँप — तुम कहाँ रहते हो? किसी बावड़ी, कुएँ या तालाब में?
संस्कृत
गड्गदत्तः — कूपे। आगच्छ। मया सह कूपस्य अन्तः प्रविश्य मम शत्रून् नाशय।
हिंदी अनुवाद
गड्गदत्त — मैं कुएँ में रहता हूँ। आइए, मेरे साथ कुएँ के अंदर चलिए और मेरे शत्रुओं का नाश कर दीजिए।
साँप का कुएँ में प्रवेश
संस्कृत
ततः सर्पराजः तस्य वचनं स्वीकृत्य अकथयत्— “अलं चिन्तया। अन्धः अस्मि! मां कूपं नय।”
हिंदी अनुवाद
तब साँप ने उसकी बात मानकर कहा— “चिंता मत करो। मैं अंधा हूँ, मुझे कुएँ तक ले चलो।”
संस्कृत
तदा तत्र गत्वा गड्गदत्तः तस्मै प्रतिदिनम् एकैकं मण्डूकं भोजनाय प्रयच्छति स्म। क्रमशः सः सर्पः सर्वान् भेकान् भुक्त्वा अकथयत्— “क्षुधितः अस्मि। प्रयच्छ मे अन्यद् भोजनम्।”
हिंदी अनुवाद
वहाँ पहुँचकर गड्गदत्त प्रतिदिन साँप को एक-एक मेंढक भोजन के लिए देने लगा। धीरे-धीरे साँप ने सभी मेंढकों को खा लिया और कहा— “मैं अभी भी भूखा हूँ। मुझे और भोजन दो।”
संस्कृत
गड्गदत्तः अवदत्— “मार्गं देहि येन बहिः गत्वा अन्यस्मात् जलाशयात् मण्डूकान् आनयामि।”
हिंदी अनुवाद
गड्गदत्त ने कहा— “मुझे बाहर जाने का रास्ता बता दो, ताकि मैं किसी दूसरे जलाशय से और मेंढकों को लेकर आ सकूँ।”

कथा का अंतिम भाग

संस्कृत:

ततः सर्पः तस्मै मार्गं ददातु। गड्गदत्तः बहिः आगत्य सोल्लासम् अवदत्— “न गड्गदत्तः पुनरेति कूपम्।”
हिंदी अनुवाद:

तब साँप ने उसे बाहर निकलने का रास्ता दे दिया। गड्गदत्त बाहर आकर बहुत प्रसन्न हुआ और मन में कहा कि अब गड्गदत्त दोबारा इस कुएँ में नहीं आएगा।
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