🌸 संस्कृत श्लोक एवं हिंदी भावार्थ 🌸
प्रमुख संस्कृत श्लोकों का सरल हिंदी अनुवाद और भावार्थ
१. सम्पत्तौ च विपत्तौ च...
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये यथा॥
हिंदी अनुवाद
जिस प्रकार सूर्य उदय होते समय भी लाल दिखाई देता है और
अस्त होते समय भी लाल ही दिखाई देता है, उसी प्रकार महान
लोगों का व्यवहार सुख-संपत्ति और दुख-विपत्ति
दोनों परिस्थितियों में समान रहता है।
भावार्थ
महान व्यक्ति सुख मिलने पर घमंड नहीं करते और कठिन समय
आने पर निराश नहीं होते। वे हर परिस्थिति में अपने स्वभाव
और व्यवहार को समान रखते हैं।
२. यौवनं धनसम्पत्तिः...
यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्॥
हिंदी अनुवाद
यौवन, धन-संपत्ति, अधिकार और विवेकहीनता—इनमें से
एक-एक भी मनुष्य के लिए अनर्थ का कारण
बन सकता है। फिर जहाँ ये चारों एक साथ हों, वहाँ क्या होगा!
भावार्थ
युवावस्था, धन और शक्ति यदि विवेक के बिना मिल जाएँ तो
व्यक्ति गलत रास्ते पर जा सकता है। इसलिए जीवन में धन
और शक्ति के साथ विवेक और समझदारी बहुत
आवश्यक है।
३. दातव्यमिति यद्दानम्...
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥
हिंदी अनुवाद
जो दान इस विचार से दिया जाता है कि
दान करना हमारा कर्तव्य है, बदले में किसी
प्रकार के उपकार की इच्छा किए बिना, उचित स्थान, उचित समय
और योग्य व्यक्ति को दिया जाता है, उसे
सात्त्विक दान कहा जाता है।
भावार्थ
दान हमेशा निःस्वार्थ भाव से, सही समय पर, सही स्थान पर
और योग्य व्यक्ति को देना चाहिए। बदले में किसी लाभ की
इच्छा रखना उचित नहीं है।
४. त्यजेदेकं कुलस्यार्थे...
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥
हिंदी अनुवाद
कुल के हित के लिए एक व्यक्ति का त्याग
कर देना चाहिए। गाँव के हित के लिए कुल का त्याग कर देना
चाहिए। देश के हित के लिए गाँव का त्याग कर देना चाहिए और
आत्मकल्याण के लिए पूरी पृथ्वी का भी त्याग कर देना चाहिए।
भावार्थ
इस श्लोक में बताया गया है कि
बड़े हित के लिए छोटे हित का त्याग
करना चाहिए। व्यक्तिगत हित से परिवार, परिवार से समाज
और समाज से देश का हित अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।
५. मित्रद्रोही कृतघ्नश्च...
मित्रद्रोही कृतघ्नश्च यश्च विश्वासघातकः।
ते नराः नरकं यान्ति यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
हिंदी अनुवाद
जो व्यक्ति अपने मित्र के साथ विश्वासघात करता है, जो
उपकार को भूल जाता है और जो किसी के विश्वास को तोड़ता है,
ऐसे मनुष्य सूर्य और चंद्रमा के रहने तक नरक के
समान दुख भोगते हैं।
भावार्थ
हमें अपने मित्रों के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए,
दूसरों के उपकार को नहीं भूलना चाहिए और किसी के विश्वास
को नहीं तोड़ना चाहिए। विश्वासघात और कृतघ्नता
बहुत बुरे गुण हैं।