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10. सहजः स्वास्थ्यलाभः

आयुर्वेदीयौषधिगुणाः (Ayurvedic Medicinal Herbs) - Tulasi, Amalaki, Nimba, Haridra, Ardraka Translation & Explanation
🌿 आयुर्वेद • संस्कृत • हिंदी

आयुर्वेदीयौषधिगुणाः

📖 परिचय
नीचे प्रत्येक संस्कृत श्लोक का सरल और स्पष्ट हिंदी अनुवाद भी दिया गया है।
इस लेख में आयुर्वेद के प्रमुख औषधीय पौधों—तुलसी, आमलकम् (आँवला), निम्बः (नीम), हरिद्रा (हल्दी) और आर्द्रकम् (अदरक) के श्लोक, उनका पदच्छेद, अन्वय और विस्तृत हिंदी भावार्थ प्रस्तुत किया गया है।

1. तुलसी (Tulasi)

संस्कृत श्लोक तुलसी कटुका तिक्ता ह्युष्णा दाहपित्तकृत् ।
दीपनी कुष्ठकृच्छ्रास्त्रपार्वरुक्कफवातजित् ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
तुलसी कड़वी तथा तिक्त रस वाली और उष्ण प्रकृति की होती है। यह दाह एवं पित्त को बढ़ा सकती है तथा अग्नि को प्रदीप्त करती है। यह कुष्ठ, मूत्रकृच्छ्र, रक्तदोष, पार्श्वशूल तथा कफ-वात से उत्पन्न विकारों को दूर करने में उपयोगी मानी गई है।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
तुलसी कटुका तिक्ता हृद्या उष्णा दाह-पित्त-कृत् दीपनी कुष्ठ कृच्छ्रास्र-पार्श्वरुक् कफ वात जित्।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
तुलसी कटुका, तिक्ता, हृदया, उष्णाह् (च अस्ति)। सा दाहं पित्तं च करोति, दीपनी (च भवति)। सा कुष्ठ-कृच्छ्रास्र-पार्श्वरुक्-कफवातजित् (अस्ति)।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
तुलसी कटु (कड़वी) और तिक्त रस से संपन्न, उष्ण वीर्य वाली तथा हृदय के लिए हितकारी (हृद्या) होती है। उष्ण वीर्य होने के कारण यह जठराग्नि को प्रदीप्त करती है, अतः इसे 'दीपनी' कहा जाता है। यह कफ और वात का शमन करती हुई श्वास, काँसी तथा वात-कफ विकारों में हितकारी होती है। रक्तदोष, कुष्ठ, मूत्रकृच्छ्र, पार्श्वशूलादि (पसली का दर्द) रोगों में इसका उपयोग प्रशस्त है। उष्ण स्वभाव के कारण यह पित्त प्रकोप को भी उत्पन्न कर सकती है, अतः पित्त प्रधान प्रकृति वाले लोगों के लिए इसका मितसेवन (सीमित मात्रा में सेवन) अपेक्षित है।

2. आमलकम् - आँवला (Amalakam / Amla)

संस्कृत श्लोक हन्ति वातं तदम्लत्वात् पित्तं माधुर्यशैत्यतः ।
कफं रूक्षकषायत्वात्फलं धात्र्यास्त्रिदोषजित् ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
आँवले का फल अम्लता के कारण वात का, मधुरता और शीतलता के कारण पित्त का तथा रूक्ष और कषाय गुण के कारण कफ का शमन करता है। इसलिए आँवला त्रिदोषों को संतुलित करने वाला माना गया है।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
हन्ति वातम् तद्-अम्लत्वात् पित्तम् माधुर्य-शैत्यतः कफम् रूक्ष-कषायत्वात् धात्र्याः फलम् त्रिदोप-जित् (त्रिदोषजित्)।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
धात्र्याः फलं तत् अम्लत्वात् वातं हन्ति, माधुर्यशैत्यतः पित्तं (हन्ति), रूक्षकषायत्वात् कफं (हन्ति)। अतः धात्र्याः फलं त्रिदोषजित् (त्रिदोषजित्) (अस्ति)।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
धात्रीफलम् (आँवला) षड्रसयुक्त होने के कारण विशिष्ट महत्व रखता है। इसका प्रमुख अम्ल रस वात शमनाय कारण होता है। मधुर विपाकत्वात् तथा शीतवीर्यत्वात् पित्तदोष का प्रशमन होता है। कषाय रसप्रधानत्वेन रूक्षगुणेन च कफदोषोपि शमं याति। एवं परस्परविरुद्धगुणसमन्वितत्वात् धात्रीफलम् त्रिदोषहराणां द्रव्यांमध्ये श्रेष्ठत्वेन परिगण्यते। रसायनत्वात् च दीर्घायुष्य-बल-वर्ण-ओजः वर्धनाय प्रशस्यते।

3. निम्बः - नीम (Nimba / Neem)

संस्कृत श्लोक निम्बफलं रसे तिक्तं पाके तु कटुभेदनम् ।
स्निग्धं लघूष्णं कुष्ठघ्नं गुल्मार्शकृमिमेहजित् ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
नीम का फल रस में तिक्त (कड़वा) होता है और पाचन के बाद कटु प्रभाव वाला माना गया है। यह स्निग्ध, हल्का और उष्ण है तथा कुष्ठ, गुल्म, अर्श, कृमि और मेह आदि विकारों में उपयोगी बताया गया है।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
निम्बफलम् रसे तिक्तम् पाके तु कटुभेदनम् स्निग्धम् लघूष्णम् कुष्ठ-घ्नम् गुल्मार्शः-कृमि-मेह-जित्।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
निम्बफलं रसे तिक्तम्, पाके तु कटु तथा भेदनं (भवति)। (तत्) स्निग्धं, लघु, उष्णं, कुष्ठघ्नं, गुल्मार्श - कृमिमेहजित् (च भवति)।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
निम्बफल स्वभावतः तिक्तारसप्रधानं कटुविपाकयुक्तं च भवति। स्निग्धत्वेन वातस्य अतिप्रकोपं न करोति, उष्णवीर्यत्वेन च कफवातशमनं करोति। भेदनगुणयुक्तत्वात् मलसङ्गं निवारयति। तस्य कुष्ठ-गुल्म-अर्श-कृमि-प्रमेहादिषु विशेषोपयोगिता निर्दिष्टा अस्ति। अतः निम्बफलं दोषशोधनपूर्वकं रोगप्रशमनकारितवेन आयुर्वेदे प्रशस्यते।

4. हरिद्रा - हल्दी (Haridra / Turmeric)

संस्कृत श्लोक हरिद्रा कटुका तिक्ता रूक्षोष्णा कफपित्तनुत् ।
वर्ण्या त्वग्दोषमेहास्रशोथपाण्डुव्रणापहा ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
हल्दी कटु और तिक्त रस वाली, रूक्ष तथा उष्ण प्रकृति की होती है। यह कफ और पित्त का शमन करने वाली तथा वर्ण को निखारने वाली मानी गई है। यह त्वचा-विकार, मेह, रक्तदोष, सूजन, पाण्डुरोग और घावों में उपयोगी बताई गई है।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
हरिद्रा कटुका तिक्ता रूक्षोष्णा कफ-पित्त-नुत् वर्ण्या त्वक्-दोष-मेह-अस्र-शोथ-पाण्डु-व्रण-अपहा।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
हरिद्रा कटुका, तिक्ता, रूक्षा, उष्णाह् (उष्णा), कफपित्तनुत् (च अस्ति)। (सा) वर्ण्या (तथा च) त्वग्दोषमेहास्रशोथ - पाण्डुव्रणापहा (भवति)।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
हरिद्रा कटु-तिक्तारससंपन्ना, रूक्षगुणा उष्णवीर्या च भवति। कटु-तिक्तरसाभ्यां कफस्य शमनं करोति, उष्णवीर्येण स्तब्धतां शोथं च निवारयति। तस्याः रक्तप्रसादकत्वात् वर्ण्यत्वं प्रसिद्धम्। प्रमेह-त्वग्विकार-रक्तदोष-शोथ-पाण्डुरोग-व्रणेषु हरिद्रायाः विशिष्टोपयोगिता आयुर्वेदग्रन्थेषु प्रतिपादिता। व्रणशोधन-रोपणकर्मणि कुष्ठादिरोगेषु अपि हरिद्रा प्रशस्ता मन्यते।

5. आर्द्रकम् - अदरक (Ardrakam / Ginger)

संस्कृत श्लोक कटुका मधुरा पाके रूक्षा वातकफापहा ।
ये गुणाः कथिताः शुण्ठ्यास्तेऽपि सन्त्यर्द्रकेऽखिलाः ॥
🌼 हिंदी अनुवाद
अदरक कटु रस वाला और पाचन के बाद मधुर विपाक वाला माना गया है। यह रूक्ष गुणयुक्त तथा वात और कफ का शमन करने वाला है। सोंठ के जो गुण बताए गए हैं, वे सभी गुण अदरक में भी पाए जाते हैं।
📌 पदच्छेदः (Padchheda)
कटुका मधुरा पाके रूक्षा वात-कफ-अपहा ये गुणाः कथिताः शुण्ठ्याः ते अपि सन्ति आर्द्रके अखिलाः।
🔗 अन्वयः (Anvaya)
(शुण्ठी) कटुका मधुरा पाके रूक्षा वातकफापहा (च अस्ति)। ये गुणाः शुण्ठ्याः कथिताः, ते अखिलाः अपि (गुणाः) आर्द्रके सन्ति।
💡 भावार्थः (Hindi Bhavartha / Explanation)
अत्र आर्द्रकस्य गुणाः शुण्ठ्या समानाः एवेति निरूपिताः। यद्यपि आर्द्रकं शुण्ठ्याः पूर्वावस्था अस्ति, तथापि तयोः गुणास्तु समाना एव। आर्द्रकं कटुरसात्मकं, मधुरविपाकयुक्तं, रूक्षगुणप्रधानं, वातकफशामकं च भवति। अतः अग्निमान्ध्ये, अरुचौ, आमदोषे, कफप्रधानकास-श्वासयोः, ग्रहणीविकारादिषु चैतत् हितकरम्।
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