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२. - अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका _ सारांश

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका

📖 पाठ: अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका

देवभूमि उत्तराखंड यात्रा, चित्रग्रीव की नीतिकथा और संगठन की शक्ति

📌 प्रस्तावना

कुछ मित्र विद्यालय के ग्रीष्मावकाश में उत्तराखंड की देवभूमि के दर्शनों हेतु गए। वह समय वर्षा ऋतु का प्रारंभ था। सभी गौरीकुंड नामक स्थान पहुँचे। जब वे श्रीकेदारनाथ की ओर बढ़ रहे थे, तभी तेज़ वर्षा शुरू हो गई, और चारों ओर अंधकार छा गया। नदी का पुल टूट गया और पहाड़ खिसकने लगा। सभी ज़ोर-ज़ोर से रोते हुए भगवान से प्रार्थना करने लगे — "हे भगवान! हमारी रक्षा करो।"

💬 नायक सुधीर का संवाद
सुधीर: "अरे मित्रों! इस विपत्ति के समय हम धैर्य रखकर किसी उपाय की सोच करें।"
दिनेश: "भाई! मृत्यु निकट है, उपाय कैसे सोचें?"
सुधीर: "मित्र! चिंता मत करो। जब वर्षा शांत होगी और मौसम साफ़ होगा, तब हम मिलकर पुल और रास्ते का निर्माण करके अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेंगे।"
सुरेश: "क्या हम यह कठिन काम कर पाएँगे?"
सुधीर: "मित्रों! आत्मविश्वास की शक्ति से असंभव कार्य भी संभव हो सकते हैं। इससे हमारी रक्षा और लक्ष्य सिद्ध दोनों होंगे।"
📜 कथा का संक्षेप में सार

1. आपदा का समय: केदारनाथ यात्रा के दौरान बारिश और भूस्खलन से पुल टूट गया। छात्र घबरा गए।

2. सुधीर का धैर्य: सुधीर ने सबको संभाला और मिलकर रास्ता बनाने का हौसला दिया।

3. चित्रग्रीव और कपोतों की कथा: चित्रग्रीव की चेतावनी के बावजूद कपोत चावल के लालच में जाल में फँसे। बाद में एकता से जाल लेकर उड़ गए।

4. हिरण्यक की सहायता: मूषकराज हिरण्यक ने चित्रग्रीव के आश्रित प्रेम को देखकर सभी कपोतों के बंधन काट दिए।

5. अंतिम सीख: छात्रों ने पक्षियों की एकता से सीख लेकर स्वयं पुल का निर्माण किया और अपने व दूसरों के प्राण बचाए।

🏔️ १. ग्रीष्मावकाश यात्रा और प्रारंभिक विपत्ति
कानिचन मित्राणि विद्यालयस्य ग्रीष्मावकाशे पुण्यक्षेत्रदर्शनाय देवभूमिम् उत्तराखण्डम् अगच्छन्।
कुछ मित्र विद्यालय के ग्रीष्मावकाश में पुण्य स्थलों के दर्शन हेतु देवभूमि उत्तराखंड गए।
तदानीं वर्षारम्भकाल: आसीत्।
उस समय वर्षा ऋतु का प्रारंभ था।
सर्वेऽपि गौरीकुण्डनामकं स्थानं प्राप्तवन्तः।
सभी गौरीकुंड नामक स्थान पर पहुँचे।
यदा ते श्रीकेदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं वेगेन वृष्टिः आरब्धा।
जब वे श्रीकेदारनाथ क्षेत्र की ओर चढ़ रहे थे, तभी लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही तेज़ बारिश शुरू हो गई।
सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः। नद्या: तीव्रजलवेगेन सेतुः भग्नः। पर्वतस्खलनं सञ्जातम्।
अचानक चारों ओर अंधकार फैल गया। नदी के तीव्र जल प्रवाह से पुल टूट गया। भूस्खलन हो गया।
सर्वेऽपि उच्चस्वरेण अक्रन्दन ईश्वरं प्रार्थयन्त च 'हे भगवन्! रक्ष अस्मान् रक्ष' इति।
सभी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे और भगवान से प्रार्थना करने लगे — “हे भगवान! हमारी रक्षा करो, हमारी रक्षा करो।”
🎤 २. नायक सुधीर का धैर्यपूर्ण मार्गदर्शन
नायक: सुधीरः सर्वान् सांत्वयन् प्रेरयन् च अवदत् - "अयि भो: मित्राणि ! अस्मिन् विपत्काले वयं धैर्यम् अवलम्ब्य कमपि उपायं चिन्तयामः।"
नायक सुधीर सभी को सांत्वना देते और प्रेरित करते हुए बोले — “अरे मित्रों! इस विपत्ति के समय हम धैर्य रखकर कोई उपाय सोचें।”
दिनेश: - (सविषादम्) "अरे भ्रातः ! कि वदसि? अस्माकं मृत्यु: एवं सन्निकटे अस्ति। एवं चेत् कथम उपाय: चिन्तनीयः ?"
दिनेश: (चिंतित होकर) “अरे भाई! क्या कह रहे हो? हमारी मृत्यु इतनी समीप है। ऐसे में क्या उपाय सोचना?”
नायक: - "मित्र ! विषादं मा कुरु। यदा वृष्टिः शान्ता, वातावरणं च स्वच्छं भविष्यति तदा वयं सम्भूय सेतुं, मार्गं च निर्माय पुनः स्वलक्ष्यं प्रति गमिष्यामः।"
नायक: “मित्र! चिंता मत करो। जब वर्षा शांत होगी और वातावरण साफ़ होगा, तब हम मिलकर पुल और मार्ग का निर्माण करके अपने लक्ष्य की ओर फिर से चलेंगे।”
सुरेश: - "एतस्यां स्थितौ वयं किमेतत् अत्यन्तं दुःसाध्यम्, असम्भवं च कार्यं कर्तुं शक्नुमः ?"
सुरेश: “इस स्थिति में क्या हम इतना कठिन और असंभव कार्य कर सकते हैं?”
नायक: - "प्रियमित्राणि! वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्यं सम्भूय अवश्यं साधयितुं शक्नुम:। तेन अस्माकं लक्ष्यप्राप्तिः प्राणरक्षा चापि भविष्यति।"
नायक: “प्रिय मित्रों! हम आत्मविश्वास की शक्ति से इस असंभव कार्य को भी मिलकर अवश्य पूरा कर सकते हैं। इससे हमारा लक्ष्य भी प्राप्त होगा और जीवन की रक्षा भी होगी।”
🕊️ ३. चित्रग्रीव की नीति कथा (हितोपदेश)
अस्ति गोदावरीतीरे एको विशाल: शाल्मलीतरु:। तत्र प्रतिदिनं दूरदेशात् पक्षिणः आगत्य निवसन्ति स्म।
गोदावरी नदी के किनारे एक विशाल शाल्मली वृक्ष था। उस पर रोज दूर-दूर से पक्षी आकर निवास करते थे।
अथ कदाचित् तत्र कश्चिद् व्याधस्तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तीर्य च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः।
एक दिन वहाँ एक शिकारी आया जिसने चावल के दाने बिखेरे और जाल फैलाकर छिप गया।
तस्मिन्नेव काले चित्रग्रीवनामा कपोतराजः सपरिवारः आकाशमार्गे गच्छति स्म। केचन कपोताः वनमध्ये तण्डुलकणान् अवलोक्य लोभाकृष्टाः अभवन्।
इसी समय चित्रग्रीव नामक कपोतराज अपने परिवार सहित उड़ रहा था। कुछ कपोते चावल देखकर लालच में फँस गए।
ततो चित्रग्रीवः तण्डुलकणलुब्धान् कपोतान् अवदत् – “कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः तद् निरूप्यताम्। कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत्। सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम्।”
चित्रग्रीव ने समझाया — “इस निर्जन वन में चावल कहाँ से आए? विचार करो। शिकारी हो सकता है। बिना सोचे समझे काम मत करो।”
एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित् कपोतः सदर्पम् अवदत् – “आ: किमर्थम् एवमुच्यते? वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत काले ह्युपस्थिते। सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम्॥”
घमंडी कपोत बोला — “आपत्ति के समय वृद्धों की बात माननी चाहिए, लेकिन हर जगह सोचने बैठेंगे तो भोजन भी नहीं मिलेगा।”
तस्य वचनं श्रुत्वा चित्रग्रीवस्य च अवज्ञां कृत्वा सर्वे कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलकणान् भोक्तं प्रवृत्ताः। अनन्तरं ते सर्वे तेन जालेन बद्धाः अभवन्।
सबने चित्रग्रीव की बात अनदेखी कर चावल खाए और जाल में फँस गए।
🕸️ ४. कपोतों की विपत्ति और चित्रग्रीव का समाधान
ततो यस्य वचनात् कपोतास्तत्र बद्धास्तं सर्वे तिरस्कुर्वन्ति स्म। इदं दृष्टवा चित्रग्रीवः अवदत् – "अयम् अस्य दोषो न। अनागतविपत्तिं को वा ज्ञातुं समर्थः?"
जब सब उस कपोत को कोसने लगे तो चित्रग्रीव ने कहा — “यह इसका दोष नहीं है। आने वाले संकट को कौन जानता है?”
"अतोऽस्मिन् विपत्काले अस्माभिः अस्य तिरस्कारम् अकृत्वा कश्चन उपायश्चिन्तनीयः। यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्।"
“विपत्ति में दोष देने के बजाय उपाय सोचो। संकट में घबराना कायरों का काम है।”
"प्रियमित्राणि! लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति इति नीतिवचनं लोकसिद्धम्। अतः अस्माभिः सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम्।"
“छोटी वस्तुओं की भी एकता से कार्य सिद्ध होता है। इसलिए सब एक साथ मिलकर जाल लेकर उड़ चलो।”
एवं विचार्य सर्वे पक्षिणः जालमादाय उत्पतिताः।
ऐसा सोचकर सभी पक्षी जाल लेकर एक साथ उड़ गए।
🐭 ५. हिरण्यक मूषकराज से सहायता व उद्धार
अथ व्याधं निवृत्तं दृष्टवा चित्रग्रीव उवाच – "प्रियकपोताः! अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने वसति। स अस्माकं पाशान् छेत्स्यति।"
शिकारी के लौटने पर चित्रग्रीव ने कहा — “हमारा मित्र हिरण्यक मूषकराज गण्डकी नदी के पास रहता है, वह हमारे जाल काट देगा।”
चित्रग्रीव उवाच – "सखे हिरण्यक! किम अस्माभिः सह न सम्भाषसे?" ततो हिरण्यकस्तद्वचनं प्रत्यभिज्ञाय आनन्देन त्वरया बहिः निःसृत्य अब्रवीत – “आः! पुण्यवान् अस्मि, मम प्रियसुहृत् चित्रग्रीवः समायातः।”
हिरण्यक ने अपने मित्र चित्रग्रीव की आवाज़ पहचानकर उसका स्वागत किया।
चित्रग्रीवोऽवदत – “मित्र! पूर्वं मदाश्रितानाम् एतेषां पाशान् छिनतु, पश्चात् मम।”
चित्रग्रीव ने कहा — “मित्र! पहले मेरे आश्रितों के बंधन काटो, फिर मेरा।”
एतदाकर्ण्य हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः अब्रवीत – “साधु मित्र! अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि।”
हिरण्यक ने प्रसन्न होकर कहा — “अति उत्तम! इस आश्रित प्रेम के कारण तुम तीनों लोकों के राजा बनने योग्य हो।” और उसने सबके जाल काट दिए।
✨ नीति श्लोक १ ✨
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ, प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥
पदअर्थपदअर्थ
विपदिविपत्ति मेंअभ्युदयेसमृद्धि में
धैर्यम्धैर्यक्षमाक्षमाशीलता
सदसिसभा मेंवाक्पटुतावाणी की प्रवीणता
युधियुद्ध मेंविक्रमःपराक्रम
व्यसनं श्रुतौशास्त्रों में रुचिप्रकृति-सिद्धम्स्वाभाविक गुण

भावार्थ: महापुरुषों का यह स्वाभाविक गुण होता है कि वे विपत्ति में धैर्य, समृद्धि में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में शौर्य और ज्ञानार्जन में रुचि रखते हैं।

✨ नीति श्लोक २ ✨
अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥
पदअर्थ
अल्पानाम् अपि वस्तूनाम्छोटी-छोटी वस्तुओं की भी
संहतिःएकता / संगठन
कार्यसाधिकाकार्य को पूरा करने वाली
तृणैः गुणत्वम् आपन्नैःतिनकों से बनी रस्सी द्वारा
बध्यन्ते मत्तदन्तिनःमस्त हाथी भी बाँधे जाते हैं

भावार्थ: छोटी-छोटी चीज़ों की एकता से बड़ा कार्य सिद्ध होता है। जैसे घास के साधारण तिनकों को जोड़कर बनाई गई रस्सी से बलशाली हाथी को भी बाँधा जा सकता है।

💡 प्रेरणा एवं निष्कर्ष

जब छोटे-छोटे पक्षी संगठन और बुद्धिबल से संकट से बाहर निकल सकते हैं, तो मनुष्य क्यों नहीं? सुधीर के प्रेरक वचनों से सीख लेकर सभी छात्रों ने मिलकर पुल बनाया और अपने साथ-साथ दूसरों के प्राणों की भी रक्षा की।

सीख: एकता, आत्मविश्वास और विपत्ति के समय धैर्य ही सफलता की कुंजी है।
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