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कारक एवं उपपद - विभक्ति

कारक एवं उपपद-विभक्ति | संस्कृत व्याकरण | सभी कारक एवं विभक्तियाँ

कारक एवं उपपद-विभक्ति

संस्कृत व्याकरण

कारक, विभक्ति एवं उपपद-विभक्ति के नियम, प्रयोग और संस्कृत उदाहरण

कारक एवं विभक्तियाँ

संस्कृत व्याकरण में कारक और विभक्ति का विशेष महत्व है। वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम का क्रिया के साथ जो संबंध होता है, उसे कारक कहते हैं और उस संबंध को व्यक्त करने के लिए विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।

कर्ता कारक एवं प्रथमा विभक्ति छात्रः पठति। अश्वः धावति।
कर्म कारक एवं द्वितीया विभक्ति छात्रः पाठं पठति।

कारक एवं विभक्ति — संक्षिप्त परिचय

कर्ता प्रथमा विभक्ति
कर्म द्वितीया विभक्ति
करण तृतीया विभक्ति
सम्प्रदान चतुर्थी विभक्ति
अपादान पंचमी विभक्ति
अधिकरण सप्तमी विभक्ति

1 कारक के प्रमुख उदाहरण

कारक विभक्ति उदाहरण
कर्ता कारक प्रथमा छात्रः पठति।
अश्वः धावति।
कर्म कारक द्वितीया छात्रः पाठं पठति।
रमेशः तिलकवनपुरं गच्छति।
सम्बोधन सम्बोधन हे राम! अरे छात्र!

2 उपपद-विभक्ति

कुछ विशेष शब्दों तथा उपपदों के साथ विशेष विभक्ति का प्रयोग होता है। इन्हें उपपद-विभक्ति कहा जाता है।
उपपद अर्थ / प्रयोग उदाहरण
ऋते बिना (Without) जलम् ऋते जीवनं नास्ति।
ज्ञानम् ऋते क्रिया...
विना बिना ज्ञानं विना जीवनं नास्ति।
अन्तरेण बिना धर्मम् अन्तरेण न सुखम्।
अभितः दोनों ओर नदीम् अभितः वृक्षाः।
उभयतः दोनों ओर ग्रामम् उभयतः नदी।
परितः चारों ओर वनं परितः नदी अस्ति।
सर्वतः चारों ओर विद्यालयं सर्वतः वृक्षाः सन्ति।
अन्तरा बीच में गङ्गां यमुनां च अन्तरा प्रयागः अस्ति।
समया पास में छात्रः समया पुस्तकम् अस्ति।
निकषा पास में मम निकषा त्रिंशत् पुस्तकानि सन्ति।
अनु पीछे अध्यापकम् अनु छात्राः।
प्रति के लिए / Per छात्रः विद्यालयं प्रति गच्छति।
धिक् धिक्कार धिक् दुर्जनम्।
गत्यर्थक धातु स्थानवाची शब्द के साथ छात्रः विद्यालयं गच्छति।
मम मित्रं रूसदेशं गच्छति।
शीतकाले अहं गृहं गमिष्यामि।
क्रियाविशेषण Adverb अश्वः शीघ्रं धावति।
मृगः सत्वरं धावति।

3 ‘अधि’ उपसर्ग के साथ द्वितीया विभक्ति

‘अधि’ उपसर्ग ‘शीङ्’, ‘स्था’, ‘आस्’ धातु के साथ होने पर अधिकरण के अर्थ में द्वितीया विभक्ति होगी।

अधि + शीङ् → अधिशेते — सोता है।
अधि + स्था → अधितिष्ठति — बैठता है।
अधि + आस् → अध्यास्ते — रहता है।
यथा — छात्रः गृहम् अध्यास्ते।
अथवा
छात्रः गृहे आस्ते।

यदि ‘अधि’ उपसर्ग नहीं होगा, तो अधिकरण के अर्थ में सप्तमी विभक्ति होगी।
प्रयोग अर्थ उदाहरण
उपर्युपरि ऊपर ही ऊपर वृक्ष के ऊपर ही ऊपर पक्षी बैठा है।
अधोऽधः नीचे ही नीचे भवन के नीचे ही नीचे जल है।
अध्यधि अन्दर ही अन्दर शरीर के अन्दर ही अन्दर आत्मा है।

4 ‘वस्’ धातु के साथ द्वितीया विभक्ति

‘उप’, ‘आ’, ‘अधि’, ‘अनु’ उपसर्ग के साथ ‘वस्’ धातु होने पर अधिकरण के अर्थ में द्वितीया विभक्ति होगी।

उप + वस् → उपवसति
आ + वस् → आवसति
अधि + वस् → अधिवसति
अनु + वस् → अनुवसति
यथा — हरिः वैकुण्ठम् उपवसति / आवसति / अधिवसति / अनुवसति।

द्विकर्मक धातुओं के साथ द्वितीया विभक्ति

धातु अर्थ हिन्दी उदाहरण संस्कृत उदाहरण
प्रच्छ् पूछना शिष्य गुरु से प्रश्न पूछता है। शिष्यः गुरुं प्रश्नं पृच्छति।
दुह् दुहना गोपालक गाय से दूध दुहता है। गोपालकः गां/धेनुं पयः/दुग्धं दोग्धि।
चि चुनना बालिका वृक्ष से फल चुनती है। बालिका वृक्षं फलं चिनोति।

5 करण कारक एवं तृतीया विभक्ति

बालकः कन्दुकेन क्रीडति।
अहं नेत्राभ्यां पश्यामि।
अध्यापकः सुधाखण्डेन लिखति।
परीक्षायां योग्यतया चयनं भवति।
प्रयोग अर्थ उदाहरण
कर्मवाच्य / भाववाच्य के कर्ता में बालकेन पाठः पठ्यते।
छात्रेण हस्यते।
रामेण पत्रं लिख्यते।
स्वभाव में Natural प्रकृत्या साधुः।
गोत्रेण क्षत्रियः।
सह Together पुत्रः पित्रा सह गच्छति।
सदृशः Equal रामेण सदृशः राजा न अभवत्।
विना Without ज्ञानेन विना जीवनं नास्ति।
अलम् पर्याप्त / रोकने के अर्थ में अलं पठनेन।
अलं परिश्रमेण।
लक्षण में Symptoms गणवेशेन छात्रः।
जटाभिः तापसः।
मुखेन भीमः।
अङ्गविकार शरीर के अंग से विकार कर्णेन बधिरः।
पादेन खञ्जः।
शिरसा खल्वाटः।
अक्ष्णा काणः।

6 सम्प्रदान कारक एवं चतुर्थी विभक्ति

अध्यापकः छात्राय पुस्तकं ददाति।
राजा विप्राय गां ददाति।
‘रुच्’ धातु के साथ
अच्छा लगना — जिसे अच्छा लगे, उसमें चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।

बालक को लड्डू अच्छा लगता है — बालकाय मोदकं रोचते।
मुझे फल अच्छे लगते हैं — मह्यं फलानि रोचन्ते।
धातु / उपपद अर्थ उदाहरण
क्रुध् क्रोध करना पिता पुत्राय क्रुध्यति।
द्रुह् द्रोह करना बालः मूर्खाय द्रुह्यति।
असूय् असूया करना दुर्जनः सज्जनाय असूयति।
ईर्ष्य् ईर्ष्या करना असुराः देवेभ्यः ईर्ष्यन्ति।
नमः नमस्कार रामाय नमः।
स्वस्ति Welfare / कल्याण प्रजाभ्यः स्वस्ति।
छात्राय स्वस्ति।
स्वाहा आहुति देना / समर्पण अग्नये स्वाहा।
राष्ट्राय स्वाहा।
स्वधा पूर्वजों के लिए समर्पण पितृभ्यः स्वधा।
अलम् पर्याप्त अर्थ में हरिः दैत्येभ्यः अलम्।
मल्लः मल्लाय अलम्।

7 अपादान कारक एवं पंचमी विभक्ति

वृक्षात् पत्रं पतति।
छात्रः विद्यालयात् आगच्छति।
प्रयोग अर्थ उदाहरण
भय के अर्थ में जिससे भय हो चोर से डरता है — चोरात् विभेति।
पूर्वम् / परम् पहले / बाद में भोजन से पहले हाथ धोने चाहिए — भोजनात् पूर्वं हस्तौ प्रक्षालनं करणीयम्।
समय के बाद कार्य करना व्यर्थ है — समयात् परं कार्यं करणं वृथा।
दो में से एक को श्रेष्ठ बताने में ‘तरप्’ प्रत्यय का भी प्रयोग होता है राम से श्याम श्रेष्ठ है — रामात् श्यामः श्रेष्ठः।
लता से गीता सुन्दर है — लतायाः गीता सुन्दरतरा।
ऋते / विना बिना ज्ञान के बिना मुक्ति है — ज्ञानम् ऋते सा मुक्तिः।
परिश्रम के बिना सफलता प्राप्त नहीं होती — परिश्रमात् विना सफलता न लभ्यते।
जिससे विद्या पढ़ी जाए अध्यापक से छात्रः अध्यापकात् संस्कृतं पठति।
वारण अर्थ में जिससे निवारण किया जाए पाप से हटाता है — पापात् निवारयति।
मां शिशु को अग्नि से हटाती है — मां शिशुम् अग्नेः वारयति।
अधर्म से हटाता है — अधर्मात् वारयति।
उत्पन्न / प्रकट होने में जहाँ से उत्पन्न या प्रकट हो गङ्गा हिमालयात् / हिमवतः प्रभवति।
क्रोध से मोह उत्पन्न होता है — क्रोधात् मोहः जायते।

त्वरित पुनरावृत्ति

प्रथमा कर्ता कारक
द्वितीया कर्म कारक
तृतीया करण कारक
चतुर्थी सम्प्रदान कारक
पंचमी अपादान कारक
सप्तमी अधिकरण कारक
महत्वपूर्ण बात: उपपद के अनुसार विभक्ति का प्रयोग बदल सकता है। इसलिए केवल कारक याद करने के साथ-साथ उपपद-विभक्ति के प्रमुख नियम और उदाहरण भी याद करना आवश्यक है।

© संस्कृत व्याकरण | कारक एवं उपपद-विभक्ति

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